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संजय असवाल "नूतन"

Abstract

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संजय असवाल "नूतन"

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बेफ़िक्री

बेफ़िक्री

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वो जो ऊंची ऊंची, 

चमचमाती इमारतें हैं,

जो बुलंदियों के

आसमान को छूती हैं,

उन्हीं के पीछे,


एक बेहद संकरी गली में, 

कूड़े के ढेर से होते हुए, 

एक छोटा सा मकान है, 

मेरा,

मकान क्या झोपड़ा कहो उसे,

टूटा, फूटा पन्नियों से ढका, 

एक कमरे का मकान,


जहां मैं रहता हूं, 

बड़े शान से,

अपने ही अंदाज में,

बेफिक्री से, 


बिना किसी टूट फुट के, 

या कुछ चोरी की शंका मन में लिए,

चैन से सोता हूं,

उधर उन बड़ी चमचमाती,

इमारतों के बड़े बाबू साहेब,


परेशान, चिंताग्रस्त,

खिड़की से डपट कर 

इमारत के गार्ड को,

ठीक से पहरेदारी की नसीहत देते, 

सोने की कोशिश कर रहे हैं।


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