STORYMIRROR

मानव सिंह राणा 'सुओम'

Abstract

4  

मानव सिंह राणा 'सुओम'

Abstract

बेनक़ाब

बेनक़ाब

1 min
351

कल तक थे अपने अब महताब हो गए।

सुबह सुबह देखा तो आफ़ताब हो गए।


रौशनी से नजर आते रहे अक्सर हमें।

अब पता चला अँधेरे बेहिसाब हो गए।


इंसानियत के चर्चा थे अभी तक आपके 

कैसे अब तुम आदमी बड़े खराब हो गए


सिरमौर थे अभी तक तो आप घोड़े के।

वक़्त बदला कि आप अब रक़ाब हो गए


अब वो इतना बदल गए 'सुओम' क्यों।

चर्चा है चेहरे ही उनके बेनकाब हो गए


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract