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Praveen Gola

Abstract

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Praveen Gola

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बेखबर सी इन रातों में

बेखबर सी इन रातों में

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बेखबर सी इन रातों में

तुम पास मेरे आ जाओ

फिर एक अगन लगा जाओ

फिर एक अगन बुझा जाओ।


तेरे साथ की फिर तलब लगी

मैं तड़प रही जैसे जल बिन मछली

तुम वही सब दोहरा जाओ

मुझे अपनी लत लगा जाओ।


ये वक्त बड़ा बेमानी हुआ

जिसने हंसी पलों को छीन लिया

इस वक्त को हरा जाओ

अपनी आशिकी फैला जाओ।


दिन काटे तो कट गए

पर ये रात सच कटती नहीं

उस रात के थोड़े वो पल

इस रात में लौटा जाओ।


हर आग तेरे नाम की

तेरे नाम से ही बुझती है सच

बेखबर सी इन रातों में

तुम पास मेरे आ जाओ।


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