बेघर इंसान
बेघर इंसान
बिना किसी ज़मीन या हर पे छत,
कोई कितना भी करें मेहनत,
नहीं मिलता उस शख्स को आराम,
क्यों की वो है एक बेघर इंसान।
भूखा प्यासा वो दर दर भटकता,
फिर भी ना कोई उस पे दया दिखाता,
जैसे वोहै कोई अनदेखा, गुमनाम,
क्यों के वो है एक बेघर इंसान।
किस्मत का है वो मारा,
उसे देख लोगों का चढ़ जाए पारा,
जब शराब पीके वो बांटे मुफ्त का ज्ञान
क्यों की वो है एक बेघर इंसान।
तरसता वो खाने को रोटी,
काश उसकी भी कोई छत होती,
ना उठाता वो रास्ते का सामान,
अगर ना होता वो बेघर इंसान।
कोई ना चाहे राहों पे भटकना,
किसी को न भाए नंगे पैर चलना,
अगर उसके पास भी होता एक मकान,
ना कहलाता आज वो बेघर इंसान।
