बैठा हूँ।
बैठा हूँ।
बस जाओ तुम मेरे हृदय में, विश्वास लिए बैठा हूँ।
थाल सजा, आसन बिछाकर और लिए घी का दीपक,
आरती की कर तैयारी, तेरे आने की आस लिए बैठा हूँ।। बस जाओ.....
जग की सारी याद भुला, मन में लिए श्रद्धा लेकर,
हृदय पटल में जगह बना कर, तेरी याद लिए बैठा हूँ।। बस जाओ......
मन पर चढ़े कई आवरण, काम-क्रोध- लोभ और मत्सर,
ख्याल तुम्हारा दिल में बसाकर, अंदाज लिए बैठा हूँ।। बस जाओ......
इस काया में भरे अनेकों, मल- आवरणों के अंबार लगे,
मुझे बचा लो इन शैतानों से, मोहब्बत लिए बैठा हूँ।। बस जाओ.....
यह दरबार दीन को आदर, दर पर तेरे जो भी आते,
मत ठुकराना तुम "नीरज" को, इकरार लिए बैठा हूँ।। बस जाओ......
