STORYMIRROR

Gazala Tabassum

Abstract

4  

Gazala Tabassum

Abstract

बैरी हवा

बैरी हवा

1 min
266

बोसा तुम्हारा आज किसी ख़्वाब सा लगे

वो वक़्त आज भी वहीं ठहरा हुआ लगे


बिरहन के मारे दिल को भला और क्या लगे

नागिन सी आज बैरी ये काली घटा लगे


ठंढी हवाएं ,तारे हसीं रात खुशनुमा

चेहरा मगर क्यों चांद का उतरा हुआ लगे


कंकर ये किसने मारी है माज़ी की झील में

तूफ़ान दिल मे उठ रहा,बैरी हवा लगे


रस्ता तवील है तेरा मंज़िल भी दूर है

मेरे रक़ीब जा ,तुझे मेरी दुआ लगे


रिश्ता वफ़ा का आ गया है कैसे मोड़ पर

हैं साथ फिर भी दरमियां इक फासला लगे


मुद्दत के बाद देखा है मैंने जो आईना

हैरान मुझको देख के क्यों आईना लगे।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Gazala Tabassum

ग़ज़ल

ग़ज़ल

1 min पढ़ें

ग़ज़ल

ग़ज़ल

1 min पढ़ें

ग़ज़ल

ग़ज़ल

1 min पढ़ें

ग़ज़ल

ग़ज़ल

1 min पढ़ें

ग़ज़ल

ग़ज़ल

1 min पढ़ें

ग़ज़ल

ग़ज़ल

1 min पढ़ें

ग़ज़ल

ग़ज़ल

1 min पढ़ें

ग़ज़ल

ग़ज़ल

1 min पढ़ें

Similar hindi poem from Abstract