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बिमल तिवारी "आत्मबोध"

Abstract

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बिमल तिवारी "आत्मबोध"

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बात

बात

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बातों  को  बढ़ाना  छोड़  दे

बातों  से  बहकाना  छोड़  दे


सिमट  गए  हैं  जो  जो  मुद्दे

उसे बातों से उठाना  छोड़ दे


बातों से बात बनाना छोड़ दे

बातों से लात जमाना छोड़ दे


प्यार मुहब्बत के आलम में

बातों से नफ़रत सिखाना छोड़ दे


बातों  से  भरमाना छोड़ दे

दंगे  फ़साद कराना छोड़ दे


याद तू आये हर आलम को

बातों से अपनी भुलाना छोड़ दे 


खींचा है  सद्भाव का रेखा

बातों  से  मिटाना  छोड़  दे


बातों से दिल मे उतरना सिखों

नज़रों से सबकी गिरना छोड़ दे


बातें मिली हैं गर तुझको तो

बातों से सबको रुलाना छोड़ दे।


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