STORYMIRROR

Shivanand Chaubey

Drama

3  

Shivanand Chaubey

Drama

बाल मन

बाल मन

1 min
238

मन गंगा सा पावन निर्मल

ऊर में भाव संजोये चंचल

वात्सल्य में स्नेह के धागे

जैसे पिरोता अपना बालमन 


माँ का आँचल माँ की गोदी

छूट गए सब खेल खिलौने

छूट गयी वो माँ की लोरी

जैसे सपने संजोता बालमन 


छूट गए सब संगी साथी

छूट गए सब बाग़ बगीचे

छूट गयी सब गाँव की गलियां

जैसे यादों में रोता बालमन 


काश की फिर ऐसा हो जाए

मिल जाये वो प्यारा बचपन

अब तक यादों के झरोखे से

जैसे हर पल रोता बालमन 


अब अतीत के पन्नों की यादों में

अंकित और चित्रित बचपन

कहने की बातें बस केवल

धीरे धीरे खोता बालमन।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Drama