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औरत

औरत

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मुझपे ज़ाहिर है तो इंसान समझ पहले

ख़वाहिशे नस्ल है तो औरत को समझ पहले।


मुझे पाना है तो उर्दु की तरह घुल मुझ में

रंगों छंदों की तरह मुझ में उतर पहले।


मैं तो ख़ुशबू हूं बसने को कब न राज़ी थी

तू इस घर घर तो समझ पहले।


दिया मिट़्टी का भी बचा लेता है असमत दर की

तू मैरी लौ को दुनिया में तो ला पहले।


चमकने दे मुझे माथे पे बिन्दिया की तरह

दौलत ए मुल़्क को तमाशा तो न बना पहले।


देख डूब जाऊं न दर्दों के समन्दर मे कहीं

हमनवा न सही हमदर्द तो समझ पहले।


मेरी बच़्ची को न ला वहशी दुनिया में अभी

घर के दरवाज़े मे दो कील लगा पहले।


सहर होने दे हवाओं में ज़हर है अभी

मेरे बेटे को यह सब न दिखा पहले।


मुझसे पैदा न कर सिकऩ्दर ऐ आज़म से सपूत

मासूम की चीख़ों का हिसाब दे पहले।


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