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Vijay Kumar parashar "साखी"

Abstract

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Vijay Kumar parashar "साखी"

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अति लालसा

अति लालसा

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आदमी की अति लालसा

बिगाड़ देती उसकी दशा

राजा से रंक हो जाता है

जब वो घमंडी हो जाता है


उसकी अति महत्वकांक्षा

उसे देती हर जगह फंसा

आदमी की अति लालसा

देती उसे शूलों का मजा


न वो जीता,न वो मरता है,

हर जगह ही वो पिटता है,

आदमी की फालतू वसा

देती उसे बीमारी की दशा


जो अपने हाल में रहता है

हरपल ईबादत में रहता है

ख़ुदा देता उसे पूरा मजा

उसकी पूरी होती हर रजा


जो न रखता कोई लालसा

खुदा खुश रखता उसे सदा

वो खिलता जग-कीचड़ में,

बनकर कमल जैसा सदा


जिसके सीने में जलता रहता,

निःस्वार्थता का लगातार दीया

खुद के साथ,जग रोशन करता,

काम करता दुनिया में वो नया


मिटा देता इंद्रियों का तम घना

जिसका दिल होता निश्छल बना

वो न रखता कोई भी लालसा

फिर भी खुदा देता उसको हंसा।


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