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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Inspirational

4  

Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Inspirational

असंभव नहीं

असंभव नहीं

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असंभव नहीं फिर से प्रकृति को मनाना

यह कविता उम्मीद और पुनः निर्माण की बात करती है, जहाँ मनुष्य अपने कर्तव्यों को समझकर प्रकृति से फिर से सामंजस्य स्थापित कर सकता है। यह कविता मनुष्य की असंवेदनशीलता और पर्यावरण के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी पर आधारित है।


हरी-भरी धरती सुसज्जित चमन,  

नीला आसमां और स्वच्छ गगन,  

मंद-मंद बहती थी सुगंधित बयार,  

प्रकृति थी कभी अनमोल उपहार।


फूलों की महक , पंछियों के गीत,  

नदियों का शोर और वनदेवी रीत,  

पर इंसान ने उसे लूटा और रौंदा,  

स्वार्थ में अंधे , प्रलयी द्वार कौंधा।


पेड़ों को काटा,नदियों को सुखाया,  

जंगलों को मिटा, नभ को जलाया,  

अब सन्नाटा है जहाँ कल थी रौनक,  

प्रकृति ने अब रोष से दिखायी ठनक।


बादल भी रूठे , नदियाँ हुयीं गुमसुम,  

सूखी धरती, बादल फटते धुआँधार,  

पंछी कहीं खो गए,स्वाति बूँद इंतज़ार 

हवा में अब है नहीं वह पहले सा प्यार।


पेड़ों की छाँव में बसी वे शीतल शांति,  

आज है सुनाई देती कर्ण भेदी क्लांति,  

सिसकती धरा ,सूनी वे हरियाली डगर,  

धुएँ के बादल,नदी के आँसू बने ज़हर।


अब भी वक़्त है, कुछ कर के दिखाना,  

धरती माँ का आँचल फिर से है सजाना,  

संभव नहीं तो भी हम कोशिश ही करें,  

शायद कोई नये रास्ते फिर प्रकृति भरे। 


किया जो अनदेखा, ये प्रकृति का रोष,  

अभी भी बाकी है उम्मीद, से भरी ओस

अभी नहीं हुआ सब कुछ ध्वस्त खाक।

फिर से होंगे अंकुरण वसुंधरा की चाक


चलो फिर से लगाएँ पेड़ों की कतार,  

चलो फिर से बचा जल, सजायें संसार 

साफ करें हवा को, नगों को चमकाए 

नदियों में हो जीवन खेत लहलहायें।


असंभव नहीं है इस प्रकृति को मनाना,  

वो माँ है, सदा क्षमा का दिल में खजाना,  

बस हमें भी समझना होगा उसका दर्द,  

पड़े न कोई पत्ता औ बूटा स्याह व जर्द। 


आओ फिर से हम, ले संकल्प मान करें

हरियाली को ला फिर से नव संचार करे  

धरती को स्वजननी समझ कर अपनाएँ,  

तभी प्रकृति को हम फिर से हँसते पाएँ। 

           


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