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chandraprabha kumar

Abstract

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chandraprabha kumar

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असमानता

असमानता

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कैसे एक मन हों तुम और हम

तुम हो शहर के रहनेवाले,

अपरिचित मेरे देसी माहौल से

सब कुछ है नया तुम्हारे लिये। 


तुम समझ नहीं पाते हो

गॉंव की धरती से कटे हो,

बहुत मैं सोचती थी कि 

कहॉं ग़लत हो गया सब कुछ। 


तुम नहीं जानते कुछ भी

खुली हवा में रहना प्रकृति संग,

तुम्हारा मिज़ाज फ़रक है

तुम्हारा बचपन बीता छोटे से कमरे में। 


तुम्हें नहीं पता कुट्टी क्या है

कुट्टी काटने की मशीन क्या है ,

गायों की खोर और सानी क्या है

गाय के गोबर की गन्ध क्या है। 


गाय के ताजे दूध की उष्ण धार

क्या है तुम्हें नहीं पता,

तुमने न कभी गाय दुही

न कभी नज़दीक से देखी। 


होली का पर्व आया और चला गया

तुम्हें नहीं पता पलाश के फूल क्या हैं

टेसू का रंग क्या है कैसे पकता है

पिचकारी भर कैसे छोड़ा जाता है। 


तुम्हें नहीं पता बड़कुल्ले क्या हैं

जो होली पर गाय के गोबर से बनते हैं 

चॉंद सूरज तारे और बड़कुल्ले

माला में पिरो चढ़ाते हैं होली पर। 


तुम अनजान हो अपनी परम्पराओं से

सब तुम्हें व्यर्थ का लगता है,

तुम कहते हो क्या ज़रूरत है इसकी

 इनके बिना भी ज़िन्दगी चलती है। 


तुम्हें मुबारक हो तुम्हारी शहरी संस्कृति

मुझे प्रिय है मेरी खुली हवा की संस्कृति,

यह मेरी चिर जानी पहिचानी है

यह मेरी अपने देश की धरती है। 


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