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Yashwant Rathore

Abstract

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Yashwant Rathore

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अपने आप को बर्बाद करने को कदम

अपने आप को बर्बाद करने को कदम

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अपने आप को बर्बाद करने को कदम बढ़ाया है

अहसासो से, मन से, तन से, धन से,खुद को खाली पाया है


क्यूं कोई पहने इन फकीरों का ये चोला फिरता है

खेल इस दुनिया का नजर के सामने जब आया है


कोई भी नहीं अपना हैं फिर भी ये तलब मुझे किसकी

पहले परिवार फिर उन से वार ,वक़्त क्या दिखाया है


दर्द ,प्यार, रिश्ते, ख़्वाब, जिन्दगी है सब तेरे दिए

दुगना कर दे जाऊंगा ये सब क्या साथ मेरे आया है


सुइयां घड़ी की फिर आ मिली उसी जगह पे लौट के

हम ही ना समझ पाए, समय ने खुद को दोहराया हैं


तेरे या मेरे ,मतलब के ख्वाब , हैं घनेरे , ये बसेरे

वक़्त सूखे फूलों से अब दिल लगाने का जो आया है!


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