अफसरशाही मग्न
अफसरशाही मग्न
आजादी के ७६ साल बाद भी
देश के कई द्वीप हैं गुमनाम
उन तक विकास की रोशनी
नहीं पहुंचा सके हमारे हुक्काम
विडंबनाओं के भंवर में गोता
खाता रहा देश का लोकतंत्र
ऐसे में हम कैसे दावा करें कि
व्यवस्थाओं में हम पूरे सक्षम
जनगणना का काम भी अरसे
से चढ़ नहीं रहा है यहां परवान
ऐसे में भला कैसे हो सकेगा सभी
के लिए सही नीतियों का निर्माण
अनेक दल, सियासी लोग कर रहे
अब जातीय जनगणना की मांग
मगर ध्यान नहीं दे रहे ध्रुवीकरण
की कोशिश मे लगे सियासतदान
अफसरशाही मग्न हो खाली कर
रही देश का सरकारी खजाना
अफसरों की नजरों की वरीयता
कोठियां और कारें ही चमकाना
हे ईश्वर देश के लोगों को कीजिए
अर्थव्यवस्था के प्रति खास सतर्क
वर्ना राजनीतिकों औ अफसरों की
जुगलबंदी करेगी देश का बेड़ा गर्क।
