अनुभव
अनुभव
चल रही थी जीवन
की पथरीली राह पर ।
अपने ख्यालों में मगन
चल रही अपनी राह पर ।
तभी नजर पड़ी मनमोहक
अति सुंदर नव रंगी पुष्प पर ।
पूछा मैंने, तुम आए
कैसे यहाँ इन पत्थरों पर ।
बोला, तुम्हारे ही कारण
उद्गम हुआ मेरा यहाँ पर ।
मेरा बीज कब से दबा
पड़ा था पाषाणों में यहाँ पर ।
तुम्हारे आँसुओं ने दिया
जीवन इस पथरीली रहा पर ।
मैंने कहा, आँसू तो
बहुत बार बाहे इन शिलाओं पर ।
ऐसा क्या था उस बार
उन असवन में जो बहे यहाँ पर ।
उस बार जीवन के नव रंगों
से भरे थे अश्रु जो गिरे यहाँ पर ।
मैंने भी फूट-फूटकर बहाए
जब तक रिक्त न हुई यहाँ पर ।
बरखा भी न रिस पाई पर
तुम्हारे आँसू रिस गए प्रस्तर पर ।
और हम दुनिया के
सर्वश्रेष्ठ फूल खिल गए प्रस्तर पर ।
अनुभवों से भरे अश्रु
रिक्त पड़े नहीं रहते कहीं पर ।
वे बंजर-पथरीली भूमि
को भी महका देते हैं यहाँ पर ।
उस दिन जान गई
कीमत अपने आँसुओं की वहाँ पर ।
अब न ऐसे ही बहाऊँगी
ये मोती किसी भी जगह पर ।
सजा कर रखूँगी
मैं इन्हें अपने दिल पर ।
