अंतर्ज्ञान
अंतर्ज्ञान
अपनी चेतना को अंदर तक ले जाइए।
किसी के बारे में कुछ भी बोलने और सोचने से पहले एक बार चुप हो जाइए।
किसी पर भी कीचड़ उछालने से पहले एक बार आश्वस्त हो जाइए।
अपने कर्मों पर भी फिर से गौर फरमाइए।
खुद की और दूजे की परिस्थितियों पर भी नजर घुमाइए।
जब समझ जाएंगे सब कुछ,
तो कह ना पाएंगे आप किसी से भी कुछ।
परमात्मा के राज में परमात्मा ही कर्ता है।
मानव जीवन के दुख सुख और कर्मों का खाता वही एक तो रखता है।
जब जन्म लिया है तो अपनी चेतना को अंतर तक ले जाइए।
अंतर्मन में बैठे हुए अंतर्ज्ञान को पकड़ परमात्मा में ही समा जाइए।
अपनी चेतना को अंदर तक ले जाइए।
