""अनकही प्रीत""
""अनकही प्रीत""
अनकही सी प्रीत निभा रही हूँ
गीत युगों-युगों से उनके ही गुनगुना रही हूँ,
राह तक रही हूँ अहिल्या सी
श्री राम बन आएंगे वो प्राण भरने,
कभी तो बरसेंगे प्रीत के बादल
बस सावन के फुहार को गगन तक रही हूँ,
कुछ ना कहकर निहारना निहारकर कुछ ना कहना
एक प्यास अनन्त लगा बैठी हूं,
उस मनमोहन की सूरत मन में बिठा चुकी हूँ
उसके *अनकहे* शब्दों से*प्रिया* निखर रही हूँ मैं।

