अनकहा प्यार
अनकहा प्यार
पढ़ प्रतियोगिता का शीर्षक, मेरा तो सर चकराया,
लिखा था भाई बहन का प्यार, यह देख मैं घबराया।
था प्रश्न उस विषय का, जो विषय हमने चुना नहीं,
तकरार तो हुई थी बहुत, पर प्यार हमने सुना नहीं।
होती थी चीख पुकार, जान लें सब मैं यही कहूंगा,
पर प्रतियोगिता में जीतने को, सच से नहीं हटूंगा।
लड़ते झगड़ते मस्ती में, बीता था वो बचपन सारा,
हम दो हमारे दो वाला, वो आदर्श परिवार हमारा।
मैं छोटा था मेरी जिम्मेदारी, सारी बड़ी बहन पर थी,
बहन भी थी यूं छोटी, पर रखती नजर मुझ पर थी।
मां बताती है मुझ को, काम मेरे सारे वो ही करती थी,
तू उससे छोटा था, इसलिए प्यार बहुत वो करती थी।
खुद भी थी छोटी पर, तुझ को लटकाये फिरती थी,
गिरने ना देती पर तुझ को, भले कभी वो गिरती थी।
उसके हिस्से की टाॅफी चॉकलेट, सारी तू खा जाता था,
मौका मिलते ही, दिखा खाली छिलके उसे चिढ़ाता था।
झेल लेती थी खुद पर, पड़ते वो मां पापा के वार,
शरारत होती मेरी, बड़ी बहन को पड़ती थी मार।
मुझ को तब था पता नहीं, बस करता था तकरार,
गर सोचो तो अब लगता है, था वही हमारा प्यार।
काश कि कुछ ऐसा हो, लौटे बचपन एक बार,
मैं बतला दूँ दीदी को, कितना करता हूं प्यार।
