अंगारे
अंगारे
इस आंग को यूँ ही जलने दो, मन की बेहद
मानने वाले ए मूर्ख इंसान तुझे प्यार की कद्र ही किया।
गम की बर्फीली वादियों में बहती नाम
किन धारा जब जिंदेगी की चट्टानों से टकराकर
दिल की सुनी आंगन को भर देती है,
दिल की अंगराई में डुबकी लगाकर बस एक बुलबुले निकलते हैं।
तुमने शायद उसे दुःख और सुख का संगम
समझ बैठे पर वो तो बस एक सुरबात ही था।
जिंदगी के उतर चराओ से गुजरता हुआ वो नमकीन धारा में
डुबकी लगाकर कभी देखे हो,
सुकून ढूंढने चले हो फिर भी तुम्हे मकसद का पता ही नहीं।
दिल के उजालों में अनजान सा दस्तक,
ख्वाब बेरे फिर भी दिल है बेखबर।
टूटे हुए आईने में कभी झांककर देखना,
महानता की दवा करने वाले खुद की ही
परछाई से आखिर क्यों भागते हो।
रूह से निकलती उफ को शब्दो में
बदलकर तो देखो,
बेवफाई से भेड़े उन यादों को बस
एकबार कलम में उतारकर तो देखो।
आग भड़कता है तो भड़कने दो, उसे आंसू से न सहेलाओ।
रब दिखता है सब कुछ, बस उनसे प्यार मत मांगना
उनसे आगर कुछ मांगना ही चाहते हो तो जिंदगी ने
तुम्हें जो जख्म दिए उसे कभी सूखने न देना,
आंसुओ से बनी सिहाई के द्वारा अपनी
अनुभूतियों में वैसे सिमट जाओ के तुम्हें एक नया
दिशा मिल जाए जिसे महज एक लेखक ही समझ सकते हैं।
