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सतीश शेखर श्रीवास्तव “परिमल”

Abstract

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सतीश शेखर श्रीवास्तव “परिमल”

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अंदाजे बयां

अंदाजे बयां

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शीर्षक : दोहे- अंदाजे बयां


नादानी की बात है, समझे न समझाये

घर के अंदर की बात को, जन तक पहुँचाये। 


ज्ञान उसे पिला तू, सच तो कड़वा घूँट

सत्य बोलें सूली चढ़े, आंत पात सब झूठ। 


तोड़ सके तो तोड़ दे, बंधन के हर तार

कहते – कहते कह गये, जीवन है कारागार। 


लूला – लंगड़ा हो गया, ‘परिमल’ इक मकान

अँगना की भी आँख थी, किंवाड़ो के भी कान। 


हुक्का भी आध पिये, चौथा रखें बुझाय

जलते क्रोध को बेचकर, दाना-पानी खाय। 


तेरा हूँ मैं खैर-ख्वाह, तू मेरा हमराज़

बंधन का परिंदा सिखा दिया, जीने का अंदाज। 


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