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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Romance Tragedy Fantasy

4  

हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Romance Tragedy Fantasy

अनबनी सी चांदनी

अनबनी सी चांदनी

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4

एक तो चमचमाता हुस्न उस पर हो सोलह सिंगार 

चांदनी की अठखेलियों से चांद को हो गया है प्यार 

चांद बोला "ऐ हुस्न परी तू सबसे हसीं तू सबसे जुदा 

देख ले प्यार से इधर भी एक नजर, पहलू में तो आ" 


चांदनी बोली, मैंने सुना है कि तू आशिक दीवाना है

तू छलिया है , न जाने कितनी जगह तेरा ठिकाना है 

निशा से यारी, तेरी पूनम से प्यार, वसुधा से इकरार 

रोहिणी के साथ तो मशहूर बहुत तेरा अफसाना है 


इन सबका साथ छोड़कर यदि तू केवल मेरा हो जाये 

तो फिर सौंदर्य की रानी चांदनी केवल तेरी हो जाये" 

मुस्कुराकर चांद बोला"मैं केवल तुझसे प्रेम करता हूं 

निशा की कसम खाकर कहता हूं बस तुझपे मरता हूं 


पूनम तो महीने में एक दिन आती है उससे बैर कैसा 

वसुधा तो बहुत दूर है जहां में उसके नहीं कोई जैसा 

रोहिणी मेरी एक्स जी एफ है उससे ब्रेक अप हो गया 

दिल में अब बस तू ही तू है मैं तेरे इश्क में खो गया


अपनी तरफ भी देख , सारा जमाना तेरा दीवाना है 

तुझे देखकर झूम रहा बेईमान मौसम बड़ा सुहाना है" 

चांद की बातों से चांदनी रूठ कर अनबनी हो गई 

हुस्न और इश्क में फिर से बिना बात तनातनी हो गई 


हुस्न की आदत है झगड़ा करने की और रूठ जाने की 

इश्क ही ढोता आया है आज तक उसके नखरों की पालकी।


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