अमरत्व
अमरत्व
अगर चाहते "अमरत्व" को पाना, विद्या तुमको गहनी होगी।
सही स्वरूप विद्या का तब होगा, संगत ज्ञानी की करनी होगी।।
पढ़- लिखकर गुन नहीं जाना, समझेगी तुमको पशुवत जमाना।
विद्या का सही अर्थ जो जाना," अमरत्व" का उसको मिलता खजाना।।
अपरा ज्ञान से जीवन निर्वाह है होता, परा ज्ञान विरलों को ही मिलता।
मनुस्मृति में आत्मज्ञान की महिमा, श्रेष्ठतर अमरता प्राप्त है करता।।
अंतरज्ञान से अंतर चक्षु हैं खुलते, बिन गुरु कृपा के सुलभ न होता।
अमृत रस गुरु उपदेश में होता, जो इन के सानिध्य में रहता।।
ऋषियों का अनुभव है बतलाता, बिन गुरु विवेक, वैराग्य न मिलता।
विद्या, अविद्या का भेद तब जानो, समर्थ गुरु के पालन में जो चलता।।
ब्रह्मविद्या का अस्तित्व है इतना, जीवन- मरण से मुक्ति है पाता।
मन और बुद्धि को संयम है करती, यथार्थ ज्ञान का अनुभव है करता।।
जीवन अपना व्यर्थ मत तुम गवाओ, गुरु से इस विद्या को पाओ।
"नीरज" तो ठहरा अज्ञानी, कृपा कर अपने दर पर बुलाओ।।
