अमृत कलश
अमृत कलश
नज़र पड़ती है तो ठहर जाती है
हटती नहीं है, हटाने से भी।
तुम्हारा अंग अंग जादू है
जो मुझे जकडता है
हर अंग का ढंग निराला
हर ढंग प्रेम का प्याला
तुम्हारे जिस्म की, रग रग की क्या बात
आँखों में देखो तो डूबकर मरने को बैचेन
अधरों को तको तो रस चखकर चटकने को मन करे।
मन करता है तुम्हें ओढ़ लूँ कि बिछा लूँ
सीने से लगा लूँ, समेट लूँ खुद में तुम्हें या तुम में समा लूं
वही सुरा चखे, वही पुष्प सूंघे
जिसने तुम्हें न देखा हो जी भर
अंग प्रत्यंग की उपमा
तुम्हारे यौवन की महिमा संसार की किसी सुंदरता से नहीं हो सकती
जिनके पास उपमाएं हैं उन्हें स्त्री के रूप रंग की कदर नहीं
नख से शिख तक, यौवन भरा हर अंग
करता समाधि भंग।
मन करता है अधरों की प्यास बुझाने लूँ
तुम्हें पी लूँ, तुम्हें पर लूँ, तुम्हें जी लूं
यही स्वर्ग, यही सपना साकार
हृदय में हाहाकार।
उफ ये चेहरा इतना गोरा, चांद भी लगे फीका
अंग की हर लचक हर मोड़, हर उठाव
हर गिराव, हर गहराई
पूरी प्रकृति बसी है तुममें
शरीर अमृत कलश है
देवता व्यर्थ लड़े अमृत के लिए
देह सी सुधा कौन।
यौवन से भरी तुम्हारी देह
रस से भरी गदराई
बोराया मन
देखूँ, चूमूं लपेटूं समेटूं, क्या करूं
तन बदन ऐसा जकड़ा
तुम्हें पीकर जी जाऊँ या पीकर मर जाऊँ
तुम्हारा सोंदर्य पान, जीवन का अमरत्व पान
नयन नक्श, तुम्हारा अक्स, ठगा सा मैं।
शख्सियत मिट गयी मेरी
तुम्हारी देह, तुम्हारा नेह मेरा सब कुछ
तुम्हें पाकर अब पाना न रहा अब कुछ।
