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Taj Mohammad

Abstract Romance Tragedy


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Taj Mohammad

Abstract Romance Tragedy


अल्फाज़ ए ताज भाग-2

अल्फाज़ ए ताज भाग-2

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1.


देखो बुजुर्गों की जायदाद से आज हम बेदखल 

हो गए हैं।

ऐसे लगे जैसे हमारे ही घर में हम अपनों से कत्ल 

हो गए हैं।।


2.


अच्छा किया तुमने उस टोकरी को खरीद कर।

बेचने वाली देखो मेहनत के सही दाम पा गई।।


3.


हर्फ क्या बदले वसीयत के लोगों हम तुम्हारे लिए बेअसर हो गए है।

आए थे हमारे हिस्से में जो बाग वो सारे के सारे बेशज़र हो गए हैं।।


4.


जो हुआ था गुनाह कभी माजी में हमसे।

देखकर आज उसको दिल परेशान है गम से।।


5.


कहने को तो दुनिया से कहता हूं मुझे तेरी परवाह नहीं।

पर चुप चुप कर वह रोना मेरी जिंदगी का जाता नहीं।।


6.


हर आंख-आंख की पसंद हो जरूरी तो नहीं।

तुम्हें पूछना था उससे रिश्ता लगाने से पहले।।


7.


हैं हर नज़र में अब बस मेरा ही घर शहर में।

जो मकान था दीवार-ए-दर सजाने से पहले।।


8.


समझा दो कोई उसको खुल कर ना बोले इतना यहाँ।

इस शहर में पाबंदियाँ बड़ी है इज़हार-ए-इश्क-ए-उल्फ़त में।।


9.


जाकर देखा झोंपड़ी के अन्दर वह बूढ़ा बीमार था बड़ा।

शायद खानें के लिए कुछ कह रहा था कांपते-कांपते।।


10.


लगता है वो आँखें रोते-रोते ही सो गयीं हैं।

वरना रुख़सार पर ये निशां कहाँ से आयें।।


11.


मैंने भी बनाए है कुछ वसूल जीने के लिए।

पर तेरी खुशी की खातिर यह टूट जाए तो परवाह नहीं।।


12.


कहाँ ढूँढते हो तुम खुदा को इधर से उधर मस्जिद-ओ-मंदिर।

घर में ही है अक्स उसका जिसे तुम अपनी माँ समझते हो।।


13.


देर रात घर के दरवाजे पर दस्तक दूं मैं किसको।

डर लगता है दूसरों से इसीलिए मां को आवाज दे दिया करता हूं।।


14.


पूछते पुछते पहुँचा बाजार में जहाँ रौनकें महफिलें थी 

बड़ी।

बिकने के लिये हर दुकान पर वहाँ कई जिन्दगियाँ थी खड़ी।।


15.


वह पढ़ता है अक्सर नमाजें तन्हाइयों मे जाकर तन्हा।

चमक जो है उसके चेहरे पर वो नूर है खुदा की इबादत का।।


16.


बूढ़े चाचा अब स्कूल वाली बस अपनी बस्ती में लाते नहीं।

 बच्चों का स्कूल है घर से बहुत ही दूर तुम अभी आना नहीं।।


17.


सियासत की है बड़ी मजहब पर इन स्याह सियासत दानों ने।

बंट गया है सारा शहर ही कौमों में तुम अभी आना नहीं।।


18.


दोस्तों ने मेरे मुझको सिखाया तो बहुत कि अब दुश्मनों की मुझको जरूरत नहीं।

 दे दिया है हमने जिसको कुछ भी सही फिर से पाने की उसको मुझे हसरत नहीं।।


19.


एक वक़्त था यारों जो लगे थे कतारों में।

आज मिलने के लिए वह वक़्त दे रहे हैं।।


20.


खरीद लो गरीब लड़की के बनाए मिट्टी के दिये।

उसके भी घर में चश्म-ए-चारागां हो जाये।।


21.


वह याद ना आये सोने के वक़्त बिस्तर में हमको ऐ

ताज।

इसलिए देर शाम से इस मयखाने में जाम पे जाम पी

रहा हूं मैं।।


22.


मरना भी अगर चाहे तो वह अपनी मर्जी से मर सकती

थी नहीं।

क्योंकि पहरे की हर निगाह होती उस पर थी हर 

घड़ी।।


23.


हमने भी जी सजा थी तुमने भी जी सजा थी।

हर चीज़ की वज़ह थी कुछ भी ना बे वज़ह थी।।


24.


यह कौन सा कहर है मजहब का जिसमें उजड़े सारे आशियाने हैं।

चलो बसाएं उस बस्ती को इक बार फिर से शायद वो आबाद हो जाए।।



22. 


करते हैं ऐहतराम तेरा खुदा के बाद जहां में।

देखे हर सिर झुक जाए ऐसी शराफत हो तुम।।



23. 


कोई बता दे उनसे कि अभी मैं जिंदा हूं मरा नहीं ।

कभी कभी आफताब भी बादलों में खो जाता है।।


24. 


यूं ही तो बेवजह दिल किसी का ऐसे होता नहीं।

आँखें क्यों रोयीं है तेरी दर्द से मुझे बतलाओ ना।।


25. 


अजनबी से होते जा रहे हैं किसी से क्या कहूं और क्या सुनूँ।

एक मां ही है ऐसी जिससे कुछ कह सुन लिया लिया करता हूं।।


26. 


उसको देखना हर किसी की नजर में नहीं।

पता तक भी उसका अब तो कहीं इस शहर में नहीं।।


27. 


हर शाम महफिलें शाम थी कोठी की कभी।

अब कोई भी मेजबानी इसके दीवारों - दर में नहीं।।


28. 


अपनें हिस्से की माल-ओ-जर उसने उसे दे दी।

उसकी वजह से देखो वह गरीब अब बे ज़र में नहीं।।


29. 


या खुदा लबों पर मेरे इतनी हंसी हमेशा बनाए रखना।

चाह कर कोई मेरे जख्मों को गिने भी तो गिन ना पाए।।


30. 


आ जाऊँ तेरी आँखों की नींद बनकर तू सोजा

मुझको रातें बना के।

बेकरारी तो इतनी है धड़कनों में कि जी लूँ मैं तुझको सांसें बना के।।


31. 


तुमसे तो अच्छी है मेरी परछाई जो हमेशा साथ चलती है।

दिले दोस्त जैसी है मेरी तन्हाई जो हमेशा साथ रहती है।।


32. 


गर कोई गम है तो दे दो मुझे जीने के लिए हम तो गम से है ही भरे।

पूंछ लो दीवानों से आशिकों का दिल होता है बहुत बड़ा।।


33. 


कोई भी इल्जाम ना दूंगा मैं ज़िन्दगी में तुम्हें।

यूँ डरने की जरूरत नहीं ऐसे अंदेशों से तुम्हें।।


34. 


खुद से लड़ना है ज़िन्दगी में अब तो मुझे।

अब किसी से ना कोई जीत ना कोई हार है।।


35. 


होती नहीं है अब तिलावते कुरान की घरों में तुम्हारे।

हर किसी परेशानी की शिफा है खुदा के कुरान में।।


36. 


ये क्या हुआ है तुमको क्यों दूर हो रहे हो?।

थोड़ा सा सब्र रखो कलमें के अकीदे पर ताकत है बड़ी खुदा के कलाम में।।


37. 


भीड़ में अक्सर ही उनको अपने से गैर बनते देखा है।

कोई जाकर उनसे पूछे आखिर इसकी क्या वजा है?।।


38. 


कभी वक्त मिले तो उससे भी बात करना।

बदल जाएगा सारा तुम्हारा जो भी ख्याल है।।


39. 


तू सोचकर तो देख खुद में कि ऐसे हालात हैं क्यूँ मेरे।

एक आम से इंसान की इस तरह की जिंदगी नहीं होती।।


40. 


तोहमत न लगा मुझ पे सिलसिला तोड़ने का।

तुम्हें सोचना था ये तो दिल दुखाने से पहले।।


41. 


क्या तहरूफ़ कराना मुझसे उस मेहमाँ का।

उसको जानता हूं मैं बहुत जमाने से पहले।।


42. 


ऐसा नहीं है कि मुझको तुमसे ज़िन्दगी 

कोई भी शिकवा और शिकायत नहीं।


नाशाद हूँ मैं अपने दिल से बहुत ही मगर 

गिला करना किसी से अब मेरी आदत नहीं।।


43. 


बहुत कोशिश की पुरानी चादर से खुद को पूरा ढकने की।

पर मेरे पैरहन में थे इतने छेद कि छिपे भी तो छिप ना पाए।।


44. 


हम जैसों की कोई नहीं है यारों ज़िंदगी।

एक तो बिगड़ी किस्मत ऊपर से ग़रीबी।।


45. 


कुर्आन की हर आयत से जिंदगी को समझना।

यूं दिखावे की खातिर मस्जिदों में नमाजें ना पढ़ना।।


46. 


उसने भी भर दिया पर्चा इस बार सदर के चुनाव का।

उसको लगता है कि लोग उसके हक में मतदान करेंगे।।


47. 


ऐसे नहीं वह गरीब तरक्की याफ्ता हो गया है आते-आते ही शहर में।

ध्यान देता है वह कारोबार में हर छोटी व बड़ी बारीकी का।।


48. 


सभी कहते थे कि वह बड़ा ही कमजोर है दिल का।

पर उसको तो बड़ा फख्र है वतन पे अपने बेटे की शहीदी का।।


49. 


तोहमतों का बाजार देखो बड़ा चलने लगा है।

आदमी ही आदमी को अब तो खलने लगा है।।


50. 


शराफत तो देखो मेरी कि उनकी महफ़िल में हम अंजान बन के आये।

शरारत तो देखो उनकी बज्म में मेरे ही कत्ल का सामान बन के आये।।


51. 


आ जाऊँ तेरी आँखों की नींद बनकर तू सोजा

मुझको रातें बना के।

बेकरारी तो इतनी है धड़कनों में कि जी लूँ मैं तुझको सांसें बना के।।


52. 


उनको छूने से लगता है डर कि बड़े नाजुक से हैं कहीं वह टूट ना जायें।

करने को कर दूं महफ़िल में इशारा नजरों से पर कहीं वह रूठ ना जायें।।


53. 


दर्द है ये रूह का तुम यूँ समझ ना पाओगे।

जब मिलेंगे कभी तो इत्मिनान से बतायेंगे।।


54. 


अपने ही घर में देखो आज हम ज़लील हो गए।

तोहमतें लगाकर हम पर सब ही शरीफ़ हो गए।।


55. 


इज़हार भी कर देंगे हम उनसे अपने इश्क का थोड़ा समझ ले उनको।

कोई उनका जानने वाला, मेरा दिल से उनका तआर्रुफ़ तो कराये।।


56. 


सभी को दिख जाएंगे यकीनन तेरे गुनाह इस वारदात में।

एक माँ ही हैं जो दोष ना देगी तुझे यहाँ सब की तरह।।


57. 


वह बढ़ा चढ़ा कर पेश करता है हमेशा अपनी हस्ती।

हर सच को झूठ, झूठ को सच बना देता है जाने वो कैसे।।


58. 


इक उनके दूर जानें से हम बेकार हो गए है।

ऐसा लगे जैसे पढ़े पन्नों के अखबार हो गए है।।


59. 


चुनाव का रंग धीरे धीरे चढ़ने लगा है।

नेताओं का अपनापन दिखने लगा है।।


60. 


हर कोई हमको भूल जाएगा जिस दिन आंखे हमारी बंद हो जाएंगी।

एक माँ ही होगी बस रिश्तों में जिसको शायद यादें हमारी आएंगी।।

                    

61. 


एक बार फिर से नेता खोखले वादे आवाम से करने आएंगे।

किसी शूद्र के घर में दिखावे की इंसानियत में खाना खाएंगे।।


62. 


सभी को लगता था उसने जी है अपनी ज़िन्दगी बड़ी बे रूखी में।

हुज़ूम तो देखो जनाजे का सारा शहर ही आया है उसको दफ़नाने में।।


63. 


सुनना कभी गौर से उस आलिम की तकरीरों को अकेले में तन्हा।

उसको बड़ी महारत हासिल है कौम को मज़हब के नाम पर बड़कानें में।।


64. 


पा लेगा तू इस जहां में सब कुछ खुदा के करम से।

मां-बाप ने गर दुआ कर दी खुश होकर तेरी खिदमतों से।।


65. 


काश मेरे पापा जैसे होते गर हर लड़की के पापा।

कोई फर्क ना पड़ता फिर लड़की हो या लड़का।।


66. 


प्रेम से कहते है सब मुझको...

किस्मत वाली बिटिया हाँ किस्मत वाली बिटिया।

अपने पापा की मैं हूँ...

सबसे प्यारी बिटिया हाँ सबसे प्यारी बिटिया।


67. 


खत के संदेशे में संदेशा था सब भाइयों के लिए।

ख्याल रखना माता पिता का उसकी खुशी के लिए।।


68. 


वह जानें नहीं देता है किसी को भी कोठी के उस अंधेरे हिस्से में।

शायद कुछ पुराने राज छिपे है नीचे उस बंद पड़े तहखाने में।।


69. 


मुद्दतों बाद खबरें आयी है हवेली में खुशियों की बन के सौगात।

शाम-ए-महफ़िल में यहाँ हर सम्त आज ज़ाम पर ज़ाम चलेंगे।।


70. 


मेहनत करके वह अपने बच्चों को अच्छी तालीम दिला रहा है।

देखना यही बच्चे आगे जाकर उसका जमाने मे बड़ा नाम करेंगे।।


71. 


मोहब्बत तो मोहब्बत थी कोई कारोबार ना थी मेरी ज़िन्दगी में।

वरना मैं भी कर लेता सौदा तुम्हारे बाप से तुम्हारी बेहयाई का।।


72. 


यह और बात है कि मैं तुम्हें बददुआ देता नहीं कभी।

पर चाहता हूँ तुम्हें भी अहसास हो ज़िंदगी में

अपनों की जुदाई का।।


73. 


खामोश हैं हम बड़े तेरे हर इक लगाए इल्जाम पर।

अब इतनी भी हदें पार ना करो कि सब्र छोड़ दें हम।।


74.


सोच समझकर बोला कर तू हमेशा यहां की आवाम में।

तेरे अल्फ़ाज हैं दंगों की तरह सारे शहर में फैल जाएंगे।।


75.


मेरी दिल्लगी देखो आज मेरे काम आ गई है।

उनकी कई हसीन शामें मेरे नाम आ गई है।।


76.


कैसे बचता मैं अपने कातिलों से शहर में।

वो मेरे पैर से बहते हुऐ खूँ के निशाँ पा गये।।


77.


उसको खबर है सबकी वह जानता है सबको।

उसके फरिश्ते मुश्तैद है हर शक्स के शानो पर।।



78.


एक अरसे से भटक रहा हूं तेरे शहर में यहाँ से वहाँ बनके साकिब।

पर मेरे कदमों को तेरे घर का पता ना जानें क्यों मिलता ही नहीं।।


79.


उसको खबर है सबकी वह जानता है सबको।

उसके फरिश्ते मुश्तैद है हर शक्स के शानो पर।।


80.


दिखते नहीं परिंदे उन दरख्तों की शाखों पर।

नाजिल हुआ है कैसा कहर तुम्हारें मकानों पर।।


81.


बिगड़े पलों का जिम्मेवार मै मानूं किसको।

ज़िन्दगी में यह सब तो खाँ मों खाँ आ गये है।।


82.


पाना तेरा इत्तेफाक ना था मेरा कोई।

यह मेरी ही दुआ है जो मेरे काम आ गई है।


83.


वह मेरी ही बनाई तस्वीरें है जिन्हें चुराया गया है।

मुझे रंगों भरे हाथ दिखाने से पहले धोना ना था।।


84.


नूरे कमर से शामें बज्म होती थी अपने शवाब पर।

एक वक्त था सभी मेहमान कायल थे यहाँ के आदाब पर।।


85.


उफ ये सादगी तुम्हारी कातिल ना बन जाये।

बड़ी ही खूबसूरत हुस्न की कयामत हो तुम।।


86.


खामों खां नजरें उठती हैं महफिल में हर आनें-जानें वाले पर।

काश दिख जाए तू यूं ही बस खैर-ओ-खबर के लिए।।


87.


मेहमाँ तो बहुत थे महफिले जाँ ना था कोई।

एक आमद से तेरी महफिले शाम छा गई।।


88.


डरता नहीं हूं मरने से ऐ मेरी जिंदगी।

पर उनको तन्हाई दे दूं इतनी मेरी हिमाकत नहीं।।


89.


भूल ना पाओगे तुम शहादत इन शहीदों की।

हस्ती भगत, आजाद की वह मुकाम पा गई है।।


90.


एक सिसकती हुई आवाज सुनते हैं पड़ोस के घर से।

मालूम हुआ इक माँ रोती है अलग हुए अपने पिसर के लिए।।


91.


मजहब की नजर में कोई छोटा बड़ा ना होता है।

झूठे बेर खिलाकर साबुरी देखो श्री राम को पा गई है।


92.


रात भर जागता हूं मैं जाने क्या-क्या सोचा करता हूं।

जिंदगी रुक सी गई है अब तो हर रोज यही किया करता हूं।।


93.


यह कौन सा बाजार है जहाँ इंसानों की तिजारत होती है।

बोली लगती है यहाँ आबरु की हर घड़ी आबरु बिकती है।।


94.


शुमार होता था उसका एक वक़्त शहर की आला हस्तियों में।

वह है उस कोठी का मालिक जिसे तुम दरबान समझते हो।।



95.


इक बस तेरी ही कमी है जिंदगी में मेरी।

वैसे तो खुदा ने नवाजा है हमें बड़ी रहमतों से।।


96.


आ गया है उनका इश्क़ देखो अब अलग होने के मोड़ पर।

कोई क्या जानें इस रिश्ते में किसकी कितनी ख़ता है।।


97.


हम बुरों के बिना तुम अच्छों को कौन पूछेगा।

अपनी पहचान की खातिर हम बुरों को बुरा ही कहना।।


98.


शायद कमर को भी होने लगी है जलन उसके चेहरे के नूर से।

तभी तो आती नहीं है अब चांदनी उसके घर की छत पर रात में।।


99.


कत्ल कर देते तुम शौक़ से इश्के वफ़ा बनकर।

तुमको मारना ना था हमको हमारी इज्जत गिराकर।।


100.


पहचान ना सकोगे मेरे गमों को तुम किसी भी नजर से।

मुस्कुराने का यह हुनर मैंने सीखा है बड़ी मेहनतों से।।




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