अकेला दिल
अकेला दिल
दिल दो किसी एक को और वो भी किसी नेक को,
मंदिर का प्रसाद नहीं... जो बांट दो हर एक को।
जो ना मिला था अब तक मुझको ज़िन्दगी गंवा के
पा लिया वो सब मैंने बस एक तुम्हारा साथ पाकर
कितने दर्दनाक थे वो मंज़र, जब हम बिछड़े थे,
उसने कहा था जीना भी नहीं और रोना भी नहीं !
कहने को ही मैं अकेला हूं पर हम चार हैं।
एक मैं, मेरी परछाई, मेरी तन्हाई और तेरा एहसास।
