STORYMIRROR

SANGRAM SALGAR

Abstract

2  

SANGRAM SALGAR

Abstract

अकेला चाँद....

अकेला चाँद....

1 min
105

वो भी क्या दिन थे

चाँद को देखते-देखते ही सो जाते थे

जब माँ लोरी सुनाती थी

वो कभी गम नही महसूस करता

अकेला चाँद वो हमेशा खुश रहता है

चाँद सबको हँसाता है

वो हमें रात में सहारा देता है

गरजूओं को रोशनी भी देता है

चाँद भी हमपर बहुत सारे उपकार करता है

चाँद का रूप ही अलग है

जब भी हम देखते थे ऊसे

आज तो हम भी उसपे फिदा हैं!


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract