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chandraprabha kumar

Inspirational

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chandraprabha kumar

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अज्ञान

अज्ञान

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 अज्ञान की अँधेरी रात्रि छा जाने पर

चेतन आत्म स्वरूप आकाश में

दोष रूपी उल्लुओं की पंक्तियाँ

उड़ने लगती हैं, नर को दीन बनाती हैं। 


वह भीतर का बल खो देता है

अपना तेज़ खो देता है

दुर्गति को प्राप्त होता है

मोह में पड़ पतित हो जाता है ।


बुढ़ापा आने पर दॉंत गिरने लगते हैं 

बाल सफ़ेद हो जाते हैं 

सब कुछ जीर्ण - शीर्ण क्षीण हो जाता है

तो भी तृष्णा क्षीण नहीं होती ।


आयु इतनी क्षणभंगुर है 

जितनी की वायु द्वारा 

उड़ाकर लाया हुआ

शरद ऋतु के बादल का टुकड़ा।


भोग ऐसे चंचल हैं

जैसे कि बादलों में चमकती हुई बिजली ,

यौवन सौन्दर्य जल के बहाव की तरह

तेज़ी से जाने वाले हैं।


शरीर क्षण में नष्ट होने वाला है

न ये वस्तुएँ मेरी हैं, न मैं इनका हूँ

इस प्रकार निश्चय को दृढ़ करके 

वासना त्याग शान्त बुद्धि से करें। 



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