अहम हिस्सा हो तुम
अहम हिस्सा हो तुम
मेरे तन की हो या चाहे हो मेरे मन की...!
अहम हिस्सा हो तुम तो मेरे इस जीवन की...!!
तुमसे जुड़कर ही हमारा ये पहचान को बदलता है...!
इस जहाँ में बस इक़ तेरा ही चेहरा मेरी आँखों में पलता है...!!
सिर्फ मेरी ही नहीं तुम कई दिलों में बसती हो...!
ना जाने कितनी निगाहों में ख़्वाब बनकर सजती हो..!!
तुम्हारी सादगी से ही मिलता है तुम्हें प्रसिद्धि सम्मान..!
क्या कभी दिल इतराता है, होता है तुम्हें हुस्न का अभिमान...!!
एक तरफ हर रोज तुम्हारा दिल किसी न किसी से प्रशंसा पाता है...!
और दूसरी तरफ हमारा दिल रोज, ना जाने कितनी ठोकरें खाता है...!!
यकीनन तेरा मन मदहोशी में रहता होगा रोज प्रशंसा सुनकर वो अपने..!
और मेरा तन ठोकर खाकर भी सोचता है कि कब होंगे पूरे मेरे सपने.....!!
मेरा बदन कई बार यहाँ गिरता है मगर फिर भी चलता है
और तेरा मन फब्तियों से झुकता तो कभी तारीफ के घमंड में पलता है...!!

