अभिमान की गठरी
अभिमान की गठरी
अभिमान की गठरी सर पे रख
तू कितने पग चल पाएगा,
रे मूरख माथा ठंडा रख
इस ताप में खुद जल जाएगा।
खुद सूर्य भी तजता ताप अपना
जब सर चढ़ कर वो बोले है,
हौले से उतर कर शिखर से वो
खुद साँझ का घूंघट खोले है।
हर उजियारे पाख के बाद
अँधियारा पाख भी आता है,
जब शुभ्र, सलोना पूर्ण चन्द्र
खुद अंधियारे में जाता है।
ऊँचे पर्वत से गिरती
उच्च्श्रृंखल बहती नदिया,
ओढ़ ओढ़नी धीरज की
मंद गति से बहती है।
जब तक ये साँसे चलती हैं
जितना चाहे दौड़ ले तू
ज्यों टूटा धागा धड़कन का
ये देह सतह पे तैरेगी।
