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Sonia Chetan kanoongo

Abstract

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Sonia Chetan kanoongo

Abstract

अब शहर कुछ अपना लगने लगा है

अब शहर कुछ अपना लगने लगा है

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अब ये शहर कुछ अपना लगने लगा है

नही अंजान मैं, मुझसे कहने लगा है।


अब गलियों से थोड़ी गुफ्तगू हुई है

अब दोस्तों में महफ़िल सजने लगी है

अब ये शहर अपना लगने लगा है।


छोड़ आए थी मैं मेरी किस्सों को पीछे

मेरे शहर को पीछे, मेरे दोस्तों को पीछे,

अब नए किस्से फिर से बनने लगे हैं।


फिर नए हाथ हाथों में आने लगे हैं,

अब ये शहर अपना लगने लगा है,


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