STORYMIRROR

प्रीति प्रभा

Abstract

4  

प्रीति प्रभा

Abstract

आवाज़

आवाज़

1 min
218

आंँसू पोंछ के आने वाले कल को बुलाऊंँ

या बीते हुए कल में रहकर मैं वक़्त गवाऊंँ


किस की चौखट के आगे झोली मैं फैलाऊंँ

कौन सी दीवार पर जाकर मैं सर टकराऊँ


किस को मैं आवाज़ दूंँ किस को बेबात जगाऊंँ

आवारा गलियों में किस किस का दर खटखटाऊँ


किस किस को मैं अपना ज़ख्म दिखाऊंँ

या अपने दिल में ही इस राज़ को दफनाऊँ


अपने दिल के जज़्बात किस को सुनाऊंँ

बेमानी इस दुनियांँ में किस को आवाज़ लगाऊँ।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract