आतंकवाद
आतंकवाद
कितनों ने कर दी कुर्बान,
अपने देश के लिए ये जान,
आतंकवाद फिर भी मिट ना सका,
ये और बढ़ा ... बढ़ता ही गया।
मैं बचपन से यही सोचती रही,
ना जाने कब खत्म होगी ये लड़ी ?
एक अरसा बीत गया अब तो,
मगर ना इसकी छाप मिटी।
हम डरते रहे और डराते रहे,
एक-दूजे को ढाढ़स दिलाते रहे,
जो शहीद हुए उनकी यादों में,
एक मोमबत्ती से दिल बहलाते रहे।
आतंकवाद ऐसे नहीं मिटने वाला,
अभी और बढ़ेगी इसकी ज्वाला,
हमें उस ज्वाला में जल जाना है,
हर आतंकवादी को कदमों पर गिराना है।
आओ चलो सब मिलकर उठायें शमशीर,
लिखें एक एतिहासिक आतंकवादी तकदीर,
कि जो भी आतंकवाद को गले लगायेगा,
उसका सर यूँ ही कुचला जायेगा।।
