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Shailaja Bhattad

Abstract

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Shailaja Bhattad

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आसमान

आसमान

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बादलों पर घर नहीं  बादलों से परे जाना था   

आज न बादल है ना आशियाना  

है तो बस परिजनों की अभिलाषा।

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पहले बादल फिर बादलों के टुकड़े दिखे

कभी राहों में उलझते   तो कभी राहों को उलझाते मिले

ये टुकड़े थे कि सिर्फ़ शोर का सामान बने।

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आसमान ने धरती की झांकी सजाई है आज  

स्याह -सफेद टुकड़ों ने   कई आकृतियां बनाई है आज  

कभी रेगिस्तान की गर्मी तो कभी पर्वतों की ठंड  महसूस कराई है आज।

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