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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

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आपसे रूबरू हूँ

आपसे रूबरू हूँ

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चांस जो था

उस तक पहुंचने में

जाने कितने युद्ध हुये

जाने कितना समय गुजरा।


याद कहें या इतिहास

नितांत अकेले थे

विचारों के हुजूम में

बस एक मनुष्यता को

पकड़कर अलग थलग हो गये

सबसे और ढेर सारे विचारो से भी।


फिर आया लाक डॉउन

खुद को बचाने का एक उपाय

दूरियां बनी रहनी चाहिये

शारीरिक दूरियां तो जरूरत है

अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिये


तो याद आता है

वो दौर जब हम

एक मनुष्यता को छोड़कर

अलग हो लिये थे सबसे

यूँ कहिए अस्तित्व की

सक्रियता से


और अब कितनी खुशी रही है कि

मनुष्यता और मेरा अस्तित्व

एक साथ अस्तित्व में थे।

कितना गजब का नजारा है

इन्हें छोड़कर


सब किनारे हो लिये हैं

मनुष्यता की मुख्यधारा से

और कितना दिलचस्प है

ये जो था अस्तित्व में


कितना ढका हुआ था

सामाजिक और राज ब्यवस्था से

जैसे कि अब लगता है

कितना वाहियात थी सम्बद्धता

समाज की


राजब्यवस्था की

आदमी के सहारे

यकीनन मनुष्य इस्तेमाल हो रहा था

अपने ही विरुद्ध


अपने हित की आड़ में

मनुष्यता से दूर।

खुशकिस्मत पाता हूँ खुद को

आज जब सभी कहते हैं


खुद को बदलना है

और मैंने सहजता से

खुद को बदल लिया था।


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