आकर्षण
आकर्षण
मनुष्य का स्वाभाविक आकर्षण
उसकी मनुष्यता ही थी।
ये हमारे पूर्वजों का ज्ञान था।
इसी में उनका जीवन था
जो प्रकृति को समर्पित था।
ये समर्पण ही उनकी पूजा थी
ये समर्पण ही उनका गौरव था,
ये समर्पण ही उनका आकर्षण था,
ये समर्पण ही उनका वेद था,
ये समर्पण ही उनकी शक्ति थी,
इस समर्पण में ही उनकी आसक्ति थी,
ये समर्पण ही उनकी शक्ति थी,
ये समर्पण ही उनकी विजय थी.
क्योंकि ये समर्पण ही
उनका अस्तित्व के प्रति प्रेम था
और इस प्रेम के साथ ही वो सक्रिय थे।
हम कह सकते हैं
ये सब आज भी है
बस हमें सक्रिय होना है
अपने ही इस अतीत के साथ वर्तमान में,
अपने ही भविष्य के लिये।
ये हमारा नया प्रेम है
अपने ही लिये
और अभी भी हम कितने अजनबी से हैं खुद से
पर हैं,और सक्रिय हैं
उसी समर्पण के साथ
जिसके साथ कभी जिया करते थे।
