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Chandresh Kumar Chhatlani

Abstract

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Chandresh Kumar Chhatlani

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आखिरी पंक्ति के बाद

आखिरी पंक्ति के बाद

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अधगढ़ी दुनिया बची है

जो बन रही थी मेरे हाथों से।


मेरी ही दुनिया में मैं हूँ कहाँ?

मौत के लफ़्ज़ निराकार न रहे जब,

न बची कोई कविता मेरे नाम की।


तब मैं ढूंढ रहा हूँ,

कि मेरी ही दुनिया में मैं हूँ कहाँ?


बस इक यही अधबनी कविता बची है,

जो है अधगढ़ी मेरी दुनिया सी,

छोड़ के जा रहा हूँ इसे।


तुम कर देना इसे बेहतर,

मेरी दुनिया बना देना हमारी, फिर तुम्हारी।


लिख देना सिर्फ तुम्हारा ही नाम,

इस कविता की आखिरी पंक्ति के बाद।

तुम, लिखोगे ना!

......


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