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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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आजाद सी लगती हूँ, आजाद हूँ क्या

आजाद सी लगती हूँ, आजाद हूँ क्या

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आजाद सी लगती हूँ मैंं,

मगर आजाद हूँ क्या मैंं ।।


मायके में थी जब तक,


तब तक माँ कहती रही,

घर के काम किया करो 

ससुराल जाकर करना यही है


घर में बड़ी भी हूँ मैं,

भाई के बातों से डरती हूँ लेकिन।

घर में जो छोटी सी हूँ,

तो कहा बोल भी पाऊं मैं


मन में मेरे पढ़ने की इच्छा,

पापा ने कहा अब क्या जरूरत,

इतना काफी है तुम्हारा पढ़ना लिखना


सपने देखे मैंंने कई,

जीवन साथी मेरा भी हो कोई ऐसा

जो मुझको आखिर समझेगा,


सबने कहा कल लड़के वाले आ रहे,

मेरी मन की पूछी ना किसी ने,

रिश्ता पक्का कर गए सब।


मन में मेरी दब गई सांसे ,

मैं चली गई खुद को देकर दिलासे।।


ससुराल में आजाद रहूंगी,

ये तो ख्वाबों मैं भी ना होगा कभी


सास ससुर को अपने माँ पापा से भी ज्यादा

उनकी सेवा सत्कार किए,

फिर भी कभी उनके मन के ना काम हुए


पति जो कहते अब मेरा वो पहला धर्म बन गया,

फिर भी कभी ना पति के मन का कोई कर्म हुआ।।


घर के सारे काम काज में समय व्यतीत हुआ,

थोड़ा खाली वक्त में अगर टीवी देख लिया 

तो सबको ना जाने क्यों सर दर्द हुआ


अपने ही घर में मैं बन्द सी हो गई,

और देखो मैं कितनी आजाद सी हो गई।।


माँ बनी जब तो लगा 

जीने की एक नई उम्मीद सी आ गई,

लेकिन बच्चे के बड़े होने पर 

मैं ही उन पर बोझ सी बन गई।।


उनकी खुशियों की खातिर 

मैंंने अपना पूरा जीवन वार दिया,

और मैं एक ख्वाहिश लिए कि 

मैं अपने बच्चो के साथ ही खाना खाऊ

बच्चो ने तो मेरा ये भी सपना भी नकार दिया।।


आजाद सी लगती हूं मैं,

लेकिन आजाद हूं क्या मैं।।



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