आज ख़ामोशी
आज ख़ामोशी
आज ख़ामोशी चुपचाप बैठी है
मुझेसे रूठकर अपने आप बैठी है
मनाना है मुझे भी खामोश रहकर,
इस शहर के शोर में ये आप बैठी है।
आज ख़ामोशी चुपचाप बैठी है
मुझेसे रूठकर अपने आप बैठी है
कह रही सुकून के पल खोजने आई
देखों ज़रा तन्हाई वीरानी साथ बैठी है
कहा हो तुम अकेली इस जगह भी
ये मेरी यादें लेकर दिन रात बैठी है।
आज ख़ामोशी चुपचाप बैठी है
मुझेसे रूठकर अपने आप बैठी है
अब पल गुज़रते नहीं ऐसी राहों पर
जिसकी मंज़िले लेकर तू साथ बैठी है
चला जाता हूँ तनहा दूर तक तन्हाई में
मुस्कुराया सोचा की तू तो साथ बैठी है।
आज ख़ामोशी चुपचाप बैठी है
मुझे से रूठकर अपने आप बैठी है।
