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Vijay Kanaujiya

Abstract

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Vijay Kanaujiya

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आहट की अभिलाषा में

आहट की अभिलाषा में

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प्रेम के उपवन की हरियाली

मन को मोहित करती है

पुष्पों के सौंदर्य की गरिमा

मन में हलचल करती है।


भौरों का मदमस्त समर्पण

पुष्पों पर इतराने का

मेरा मन भी करता है


मीठी यादों में खो जाने का

डाली पर कोयल की कू-कू

मधुर मिलन की आशा में,


मैं भी गुम-सुम सा बैठा हूँ

इक आहट की अभिलाषा में

इक आहट की अभिलाषा में।


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