STORYMIRROR

Chandramohan Kisku

Abstract

3  

Chandramohan Kisku

Abstract

आग

आग

1 min
223

आज जो तुम दे रहे हो 

बिना माँगे ही 

आपने मन से 

लज्जा और अपमान का दर्द।


इसे दर्द न समझो 

क्योंकि यह एक अँगार है 

राख से दबी शांत जल रही 

अँगार है 

और तुम्हारे लिए यह 

अनाम रोग है।


मेरा भी वक्त आएगा 

राख से दबी अँगार भी 

पहाड़- पर्वतों की सुखी पत्ती

खोज ही लेगी .

तब मंद वायु भी 

साथ देंगे।

 

तब धीरे-धीरे जल उठेगा 

धू-धूकर आग।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract