आदमी सुकून से मरता है
आदमी सुकून से मरता है
आदमी सुकून से मरता है,
क्योंकि जीते-जी, उसे दर्द नहीं होता।
जब,
बेटा हो तो कंधों का बोझ कम करने वाला बन जाता है,
भाई हो तो बचपन का शोर रह जाता है।
पति हो तो कर्तव्यों में बँध जाता है,
पिता हो तो स्नेह स्वप्न में खो जाता है।
पर,
आदमी से कौन प्यार करता है।
सख्त चीज़ टूट जाती है,
टुकड़ों में बंट जाती है।
आदमी भी ऐसा ही है।
बेटा है, कुछ भी कर लेगा,
गिरते-पड़ते बढ़ लेगा।
भाई, तुम गंदे हो, मेरे बाल खींचते हो,
शिकायतों के नीचे प्यार दब जाता है।
पति हो तुम, पति की हद में रहो।
संवाद की तरंगें अवशोषित हो जाती हैं,
और स्नेह में मौन की दीवारें खिंच जाती हैं।
पिता हो तुम, माँ नहीं।
स्नेह भाव गिनतियों में उलझ जाता हैं,
मजबूती का मुखौटा ओढ़े आदमी जिए जाता है।
खाने का वक्त पत्नी तय करती है,
सोने का वक्त तय करते हैं बच्चे।
जागना तो उसे हर वक्त है।
कोई नहीं कहता, "थक गए हो, रुक जाओ,"
कोई नहीं पूछता, "कैसे हो, मुस्कुराओ।"
आदमी से प्रेम करने वाले कम ही होते हैं।
वो खुद में ही मस्त रहता है,
हर दुख को परमाणु की तरह तोड़कर,
उससे अपना ब्रह्मांड रचता है।
कहां आदमी प्रेम को तलाशता है।
इन्हीं बातों की आदत पड़ जाती है।
इसलिए मरते वक्त शायद वैराग्य का अहसास हो जाता है,
और, आदमी सुकून से मर जाता है।
