आ री बरखा!
आ री बरखा!
आ री बरखा! आ री बरखा!
इस तपती धरा पर, अपना शीतल जल बरसा।
पेड़ सब ठूंठ भए,
पंछी चहकाना भूल गए।
कुम्लाह गय हैं पुष्प सारे,
बिखरा दो तुम बादल कारे।
आ री बरखा! आ री बरखा!
इस तपती धरा पर, अपना शीतल जल बरसा।
जहां कभी बहती थी नदिया,
सूखे पत्थर दिख रहे,
सिंधु दुर्बल हो चला
वियोग तेरा कैसे सहे।
आ री बरखा! आ री बरखा!
इस तपती धरा पर, अपना शीतल जल बरसा।
