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ranjit singh

Children

3  

ranjit singh

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​आ री बरखा!

​आ री बरखा!

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आ री बरखा! आ री बरखा!

इस तपती धरा पर, अपना शीतल जल बरसा।

पेड़ सब ठूंठ भए,

पंछी चहकाना भूल गए।

कुम्लाह गय हैं पुष्प सारे,

बिखरा दो तुम बादल कारे।

आ री बरखा! आ री बरखा!


इस तपती धरा पर, अपना शीतल जल बरसा।

जहां कभी बहती थी नदिया,

सूखे पत्थर दिख रहे,

सिंधु दुर्बल हो चला

वियोग तेरा कैसे सहे।

आ री बरखा! आ री बरखा!

इस तपती धरा पर, अपना शीतल जल बरसा।


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