फूल और कांटा
फूल और कांटा
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(हैं जन्म लेते जगह में एक ही)
एक ही पौधा उन्हें है पालता।
शीत में उन पर छुमकता चाँद भी।
एक ही सी चाँदना है डालता ।।)
मेह उन पर है बरसता एक सा
एक-सी उन पर हवाएँ हैं वहीं
पर सदा ही यह दिखाता है हमें
ढंग उनके एक से होते नहीं।।
'छेद कर काँटा किसी की उँगलियाँ
फाड़ देता है किसी का वर वसन
प्यार डूबी तितलियों का पर कतर
भौर का है बेंध देता श्याम तन।।।
फूल लेकर तितलियों को गोद में
भीर को अपना अनूठा रस पिला।
निज सुगन्ध और निराले रंग से।
है सदा देता कली का जी खिला।।
