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मणिमेकलई
मणिमेकलई
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© Aniket Kirtiwar

Classics Others

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यह कथा "संगम साहित्य" तमिल पांच महाकाव्य में से एक है, जिसकी रचना ई. सा. ६०० के आसपास हुई है।

कावेरीपट्टिनम और आधुनिक श्रीलंका में जाफना प्रायद्वीप के एक छोटे रेतीले द्वीप नागा नाडू के नैनाथीवु में स्थित है। कहानी निम्नानुसार चलती है: नर्तकी-दरबारन मणिमेकलई

को शांत चोलन राजकुमार उदयकुमारन जो एक सनकी राजा था और उसके प्यार मे पागल था। उसके द्वारा पीछा किया जाता है, मणिमेकलई प्रेम में नहीं बल्कि खुद को एक धार्मिक ब्रह्माण्ड जीवन में समर्पित करना चाहती है। समुद्र देवी मनीमेकल थिवाम या माईमेखला देवी उसे खुद के पास आश्रय देती है एवं सोने के लिए रखती हैं और द्वीप माईपल्लावम (नैनीथीवु) ले जाती है। द्वीप के बारे में जानने और घूमने के बाद मणिमेकलई धर्म-आसन में आती है, जिस आसन पर बुद्ध ने पढ़ाया था और दो युद्ध नागा राजकुमारों को प्रसन्न किया था, जिसे भगवान इंद्र ने वहाँ रखा था। जो लोग पूजा करते हैं वे चमत्कारिक रूप से अपने पिछले जीवन को जानने लगते हैं। मणिमेकलई स्वचालित रूप से इसकी पूजा करती है और अपने पिछले जीवन में जो हुआ वह याद करती है।

तब वह धर्म आसन, देववा-तेलाकाई (दीपा तिलका) की अभिभावक देवी से मिलती हैं, जो उन्हें धर्म आसन के महत्व के बारे में बताती हैं और उन्हें इच्छा पुर्ती को कभी भी न असफल होने वाले भिक्षा कटोरे (कॉर्नुकोपिया) को अमृत सुरभी ("बहुतायत की गाय"), जो हमेशा भूख को कम करने के लिए भोजन प्रदान करेगा। देवी यह भी भविष्यवाणी करती है कि उनके मूल शहर में भिक्शु अरवाण आइगल उसे और सिखाएंगे। इस भिक्षा कटोरे की मदद से वह एक शापित यक्ष जो हाथी अग्नि नामक रोग से ग्रस्त होता है, जिसमें उसे बार-बार भूख लगती है उसका उद्धार करती हैं, और रोज कटोरे से अन्न प्रगट कर गरीबों में बांटती है।इस उपरांत मणिमेकलई ने उस मंत्र का उपयोग किया जो समुद्र देवी ने उसे दिया था और कावेरीपाइनम लौट आयी। जहाँ वह भिक्षुक अरवना अजीगल से मिलती है, जो उसे बुद्ध की शिक्षा का विस्तार से परिचय कराया और उसे जीवन की प्रकृति के बारे में ज्ञान देते हैं। वह तब बौद्ध भिक्षुणी बन जाती है और जन्म और मृत्यु के बंधन से खुद को छुटकारा पाने और निर्वाण प्राप्त करने के लिए प्रथाओं का पालन करती है।

मणिमेकलाई महाकाव्य साहित्य तमिल

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