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ईमानदारी के दस मिनट
ईमानदारी के दस मिनट
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© Sudha Singh

Inspirational

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शाम के पांच बज रहे थे।स्कूल छूटते ही पास के रिक्शा स्टैंड से ही घर जाने के लिए मैंने रिक्शा ले ली। रिक्शे का किराया देकर मैं घर की तरफ बढ़ी ही थी कि मैसेज चेक करने के उद्देश्य से मोबाइल फोन निकालने के लिए मैंने कुर्ते की साइड पॉकेट में हाथ डाला। पर मोबाइल वहाँ नहीं था। मैं घबरा गई। हड़बड़ाहट में मैंने अपने पर्स को अच्छी तरह से छान मारा पर मोबाइल कहीं नहीं था। मन में तुरंत कौंधा कि हो न हो मोबाइल रिक्शे में ही गिरा है। मुझे अच्छी तरह से याद था कि मैंने मोबाइल को कुर्ते की साइड पॉकेट में ही रखा था।स्कूल से निकलते वक़्त करेक्शन के उद्देश्य से मैंने दो बड़े - बड़े थैलों में बच्चों के नोटबुक्‍स भरकर दोनों कंधों पर लटका लिए थे। बुक्स के कारण थैले काफी वजनी हो गए थे। इसी कारण मोबाइल का वजन न के बराबर हो गया था और मेरी जेब से वह कब और कैसे गिर गया उसका एहसास ही नहीं हुआ।

घबराहट में भागी- भागी मैं घर के सामने वाले रिक्शा स्टैंड पर पहुँची।आसपास नजर दौड़ाई तो रिक्शा वाला वहाँ कहीं नजर नहीं आ रहा था। मन में अनेक बुरे - बुरे ख्याल आ रहे थे. एक रिक्शे वाले से मैंने पूछा, "वो... वो रिक्शे वाला कहाँ गया?उसमें मेरा फोन छूट गया है!!

मेरी आवाज सुनते ही वहाँ मौजूद सभी लोगों और रिक्शा वालों की निगाहें मेरी तरफ मुड़ गई। फिर भीड़ में से ही किसी रिक्शेवाले ने बताया कि वह तो कब का वहाँ से चला गया। डर के मारे मेरे पसीने छूट रहे थे। एक तो चैत की तपती गर्मी ऊपर से फोन न मिल पाने की निराशा। मेरी अकुलाहट बढ़ती जा रही थी। तभी दूसरे रिक्शे वाले ने मेरी तकलीफ को समझते हुए मदद करने के इरादे से अपना फ़ोन मेरी तरफ बढ़ा दिया। हड़बड़ी में मुझे अपना नंबर याद ही नहीं आ रहा था। फिर अपने आप को संयत करके मैंने दोबारा अपना नंबर लगाया। फोन की घंटी बज रही थी पर सामने से कोई रिस्पॉन्स नहीं मिल रहा था। मैंने दोबारा नंबर लगाया। परंतु रिक्शा वाले ने अपनी रिक्शा में पैसेंजर बिठा लिए थे तो उसे भी वहाँ से जाने की जल्दी थी। उसके फोन मेरे पास था इसलिए वह असमंजस में था कि अब क्या करे एक तरफ इंसानियत की माँग व दूसरी ओर पेट की रोटी। मैंने भी उसे रोकने की कोशिश नहीं की।उसका फोन उसे लौटा दिया। सोचा कि किसी दूसरे से माँग लूँगी। फोन को कान से लगाए हुए वह रिक्शे में बैठा ही था कि फोन में दूसरी तरफ से आवाज आई - " हैलो..हैलो..!"

"हैलो.. हाँ एक मिनट.. एक मिनट.." फोन पर हैलो.. हैलो.. करते हुए उसने मुझे अपना फोन पकड़ा दिया।भीतर ही भीतर मैंने राहत की एक साँस ली अब मन में फोन वापस पाने की एक उम्मीद जगी थी।

रिक्शेवाला बहुत दूर निकल चुका था किस्मत अच्छी थी कि उसने कोई सवारी नहीं बिठाई थी वरना फोन मिलना तकरीबन नामुमकिन हो जाता। मैंने बातचीत करके उसे उसी रिक्शा स्टैंड पर बुलवाया। इंतजार के वह पाँच मिनट... लगा सदियों के समान गुजरा. मन में नकारात्मक विचारों ने घेरा डाल दिया था। " कहीं रिक्शे वाले के मन में कोई पाप न आ जाए" कहीं उसने अपना मन बदल लिया तो.. मेरा कितना नुकसान हो जाएगा.... और भी न जाने कितनी ऊलजलूल बातें मुझे टोच रही थीं। "

अचानक मेरे सामने वह रिक्शाआकर रुकी उसने मेरे हाथ में मेरा फोन पकड़ाया और जाने को तत्पर हुआ तो मैंने उसे रोक लिया और मैंने ईनाम के तौर पर कुछ रुपए देने चाहे परंतु उसने साफ़ साफ इनकार कर दिया।कि वह इन रुपयों को नहीं लेगा। फिर मैंने उससे आग्रह किया - " भैया... आप इतनी दूर से लौट कर आये मेरा फोन लौटाने के लिए तो कम से कम अपना किराया तो ले लीजिए। " बिना कुछ कहे अपना किराया लेकर उसने बाकी पैसे मुझे वापस लौटा दिए। मैं अच्छी तरह से उसे धन्यवाद भी नहीं कर पाई थी कि वह रिक्शा स्टार्ट करके वह वहाँ से तुरंत निकल गया शायद उसे कहीं जाने की जल्दी थी। मैंने स्टैंड के बाकी रिक्शा चालकों को भी धन्‍यवाद दिया और वहां से चली आई।

रिक्शेवाला चाहता तो उस फोन को रख लेता और मैं कुछ न कर पाती। न तो मैं उसका चेहरा पहचानती थी और न ही मैं उसके रिक्शे का नंबर जानती थी। पुलिस में शिकायत दर्ज कराने जाती तो अधूरी जानकारी से पुलिस भी कुछ न कर पाती। ये तो उस रिक्शेवाले की नेक नीयत थी कि उसने मेरा फोन लौटा दिया और इनाम के रुपए भी नहीं लिए। कई लोगों के सामने आज वह एक मिसाल बनकर प्रस्तुत हुआ था।

आज के समय में जहाँ भाई - भाई पर भरोसा नहीं करता। झूठ, बेईमानी, चोरी मक्कारी जहाँ सिर उठाए घूमती है ऐसे परिवेश में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो भारतीय जीवन मूल्यों को आज भी सर्वोपरि रखते हैं। शायद इसी लिए कहते हैं कि इंसानियत अभी पूरी तरह से मरी नहीं है।

रिक्शा आवाज़ मोबाईल मदद

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