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गुलाब के फूल
गुलाब के फूल
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© Gaurav Sharma

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हफ्ते भर के अखबार मेज़ पर बिखरे पड़े थे। रोज़ टाईम ही कहाँ होता है इन्हें पढ़ने का। ग्यारह बजे लेकर बैठा था। चार घंटे बीत चुके थे।  टिफिन वाला दोपहर का टिफिन दे गया था। वह भी ऐसे ही रखा था। कमर में दर्द होने लगा था बैठे बैठे। 'खाना खाकर थोड़ी देर लेट लेता हूँ ' बुदबुदाते हुए मैंने अखबार तय कर दिया।

टिफिन में आज फिर वही पिछले इतवार की तरह अरहर की दाल, चावल, दो रोटियाँ, भिंडी की सब्जी और सलाद के नाम पर खीरे, प्याज़, टमाटर के चार-चार टुकड़े ही थे। बस खीर की जगह गुलाब जामुन आए थे।

बैठा नहीं जा रहा था। मैंने जल्दी-जल्दी खाना खाया और लेट गया। छत पर प्लास्टर आफॅ पेरिस के डिज़ाइन के घुमावों  की अपनी जिंदगी से तुलना करते- करते पता नहीं कब आँख लग गई।

साढ़े चार बजे होंगे जब मोबाइल बजने से आँख खुली। अधखुली आँखों से देखा तो 'बीबी' लिखा था। 'इसका फोन कैसे आ गया आज?' मैं बड़बड़ाया। पसोपेश में था कि कालॅ रिसीव करूँ या नहीं।

'बात तो कर ही लेता हूँ। पता नहीं क्यों फोन किया होगा?' सोचते हुए मैंने कालॅ रिसीव कर ली।

'कैसे हो?'

'बोलो,' मैंने बेरुखी से कहा।

'सुनो, मैं आ रही हूँ। एक-डेड़ घंटे में पहुंच जाऊंगी।' मैं कुछ नहीं बोला। कुछ सेकंड बाद उसने फोन काट दिया।

मन तो हो रहा था कि मैसेज कर दूँ कि मत आओ। मुझे कहीं जाना है। पर, तड़प भी थी उसे देखने की। तीन महीने हो गए थे उसे मुझे छोड़ कर गए हुए। एक बार भी न मिली और न फोन किया। सारे सोशल साईट्स पर भी मुझे ब्लाक कर दिया था उसने।

पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर और प्रोग्रसिव विचारों वाली लड़की से शादी करने के भी साइड-इफेक्टस हैं। ऐसी लड़कियाँ शरीर से ही औरत रह जाती हैं बस। जीवनशैली और वैचारिक रूप से तो वे मर्दों जैसी हो जाती हैं।

साढ़े पाँच बजे मैंने बिस्तर छोड़ दिया। गमलों में पानी डाला और फ्रेश हो गया। छह बजने में दस मिनट बचे होंगे जब डोरबेल बजी।

क्षण भर को उसे देख मैंने नजरें नीची कर मेनगेट की सांकल सरका दी और मुढ़ गया। उसने दरवाजा धकेला और अंदर आकर सांकल लगा दी। 'आज वो मेहमान है' सोचकर मैं अंदर के दरवाजे के पास रूक गया।

'अरे वाह! बड़े सुंदर फूल हैं,' वह दरवाज़े के बाहर रखे गमलों के पास रुक गई थी। मैं कमरे में चला आया था ।

'आज भी दो ही हैं,' अंदर आकर वह बोली। मैं मेज़ पर बिखरे अखबारों को समेटता रहा । 'याद है, जिस दिन मैं गई थी, उस दिन भी दो ही फूल खिले थे।' वह साइड वाली सोफे की सिंगल सैटी पर बैठ गई । वहीं बैठती थी वो हमेशा।

मैं मुड़कर अखबारों को अलमारी में रखने चल दिया। बहुत संघर्ष करना पड़ रहा था खुद को उसे निहारने से रोकने के लिए।

'बताओ न, और कलियाँ नहीं आईं ?'

मैंने  कुरते की जेब से सिगरेट की डिब्बी निकाली और उसकी तरफ बढ़ा दी। आँखों ने एक पल लिए मेरी कसम तोड़ दी थी।

'नहीं' वह बोली।

'ले लो। तुम्हारे वाला ब्रांड है,' मैंने दूसरी जेब में से माचिस निकालते हुए कहा। इस बार मेरी आँखें नीचे थी।

'देखा । पर, सिगरेट छोड़ दी है मैंने।' मैं जानता था उसकी आँखें मेरी आँखों के उठने का इंतजार कर रही हैं।

'पर तुमने अपना ब्रांड क्यों बदल दिया?' उसने पूछा।

'आज था नहीं कल्लू के पास। इसलिए ये ही ले आया । कम से कम इसका स्वाद तो पता है,' मैंने लंबा क़श लिया और बिना धुआँ छोड़े आँखें बंद कर ली।

आज बड़ी सिमटी सी बैठी थी वो घुटनों से घुटने जोड़े। वर्ना ऐसे बैठने की आदत कहाँ थी उसे। वो तो मर्दों की तरह टाँगें चौड़ी करके बैठती थी या फिर मेज पर रखती थी। यह संकोच है या बदलाव? मैं समझ नहीं पा रहा था। मुँह ऊपर करके मैंने धुआँ छोड़ दिया।

'तुमने बताया नहीं '

'क्या?'

'गुलाब में और कलियाँ नहीं आईं?'

'आईं थी ... अब भी आती हैं पर मैं दो कलियाँ छोड़ कर बाकी काट देता हूँ' कहकर मैंने धुएँ से मुहँ भर लिया।

'हाय, क्यों?'

तसल्ली से धुएँ के छल्ले छोड़ मैं कुछ देर उन्हें देखता रहा। इस उधेड़बुन में था कि बोलूँ या नहीं ।

'आज तुम बहुत देर लगा रहे हो जवाब देने में '

'तुम सवाल भी तो बहुत सारे पूछ रही हो '

'इतने सारे इकट्ठे हो गए हैं कि अंदर रखने की जगह नहीं बची इसलिए नए वाले उगलने पड़ रहे हैं।' पहली बार लगा कि वो वही पहले वाली अकीरा है। बदली नहीं है।

'खैर छोड़ो, बताओ न कलियों पर ये क्रूरता क्यों ?'

'क्रूरता नहीं, समझौता। तुम ही तो कहती थी कि बाग में जब दो फूल खुश हैं तो तीसरे की क्या जरूरत। इसलिए बस दो ही छोड़ देता हूँ। हर बार फूल सुबह खिलते हैं और शाम को झड़ कर बिखर जाते हैं। इस बार पता नहीं कैसे दूसरी शाम तक भी झूल रहे हैं। शायद आभास हो गया होगा इन्हें तुम्हारे आने का। तुम्हें दिखाना चाहते होंगें कि देखो दो ही हैं और खुश हैं।' मैंने आखिरी क़श भरा और सिगरेट को ऐशट्रे में दबा दिया। कनखियों से देख लिया था कि वो मुझे घूर रही थी।

सिगरेट बुझा कर मैं खड़ा हो गया, 'तुम्हारा टाईम हो गया है न। ड्रिंक बनाता हूँ तुम्हारे लिए। वि्हस्की की नई बोतल लाकर रखी है। तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी। '

'तुम ताने ही मारते रहोगे? एक बार भी देखा तक नहीं तुमने मुझे' उसने ऐसे शब्द पहले कभी इतनी नर्मी के साथ नहीं कहे थे। मैं ठिठक गया।

'तुम्हारे सिवा किसी और को देखा ही नहीं कभी मैंने। '

'मैं आज की बात कर रही हूँ।'

'आज भी देखा जो दिखाना चाहती हो। काली बिंदी लगाई है, कई सालों बाद शायद... और गुलाबी सूट, चुन्नी के साथ। लगता है नया खरीदा है। अच्छी लग रही हो ' मैंने अब भी उसकी तरफ नहीं देखा था। 'मैं ड्रिंक बनाता हूँ।'

'अरे नहीं, रुको। मैं अब नहीं पीती।'

सुनकर मैं मुस्कुराने लगा। 'किसी बाबाजी के आश्रम में जाने लगी हो क्या?'

वो हल्का सा हँसी, 'नहीं। बस सोचा कि अब औरत बन जाऊँ। इतने दिनों से इस छत के नीचे दो मर्द ही तो रह रहे थे।' एक क्षण के लिए मैंने उसे देखा। 'ये वही अकीरा है न। कहीं कोई और तो नहीं आ गई उसकी हमशकल?'

'आदतें बदल लेने से आदमी नया हो जाता है न, अनिमेष?'

मैं बस उसे देखता रहा। जवाब देने का मन ही नहीं हुआ। पता नहीं कितने सेकंड गुजरे या फिर मिनट। उसकी आँखों में मेरे लिए प्रश्न थे और मेरी आँखों में आश्चर्य।

'मैं माँ बनना चाहती हूँ अनिमेष,' उसने धीरे से कहा।

मैं उसे देखते हुए उसकी तरफ बढ़ा और उसके पास जाकर रुक गया। उसकी आँखों में सच्चाई ढूँढने की कोशिश कर रहा था। दो बूँदें उसकी आँखों से रिसकर गालों पर ढुलक गईं। मैं अपने घुटनों पर बैठा और अपना सिर उसकी गोद में रख दिया। उसने अपने गाल धीरे से मेरे सिर पर लगा दिए।

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