छोटी सी कोशिश
छोटी सी कोशिश
आज रमा अपने कमरे में अकेले बैठे चाय पी रही थी, कि अचानक ही उसके सामने सतीश आकर खड़ा हो गया। और हाथ जोड़कर कहने लगा "बहन जी मैं आपके एहसानों का बदला कैसे चुकाऊंगा। आपने मेरे ऊपर बहुत एहसान किए हैं। आज आपका दिखाऐ मार्गदर्शन से और आपकी कोशिशों से मेरी बेटी जो जो अपाहिज थी जो गूंगी और बहरी भी थी।
अपने काम में लग गई है। अगर आप कोशिश नहीं करते। अगर आप सही समय पर रास्ता नहीं दिखाते तो यह संभव ही नहीं होता।"
रमा को एकदम बहुत ही खुशी हुई कि उसकी कोशिश रंग लाई और एक बच्ची की जिंदगी सुधर गई। उसको आज भी वह दिन याद है जब वह छोटी सी बच्ची इतनी सुंदर सी फ्रॉक पहने उसके पास आई थी। जो थोड़ी चलने में लंगड़ा रही थी, और जिसकी सुनने और बोलने की शक्ति नहीं थी गूंगी बहरी थी। वह हॉस्पिटल में एक नर्स की बेटी थी।
रमा ने जब पहली बार उसे देखा उसका मन बहुत दुखी हो गया ।उसने सोचा जब हम पढ़ते थे तब एक ऐसे बच्चों के लिए स्कूल थी जिसमें उसकी फ्रेंड की मम्मी प्रिंसिपल थी।
आज भी ऐसी संस्थाएं यहां गुजरात में भी होंगी।
पता करने पर अगर कोई अच्छी संस्था हो तो इस बच्ची को वहां पर भेज दिया जाए तो इस बच्ची की जिंदगी सुधर सकती है। मगर उसके लिए पहले उसकी मां बाप को तैयार करना पड़ेगा।
क्योंकि जब बच्चे फिजिकली और मेंटली थोड़े कमजोर होते हैं। मतलब शारीरिक दृष्टि से और मानसिक दृष्टि से थोड़े कमजोर होते हैं तो कोई भी उन पर मेहनत कम करना चाहता है
क्योंकि उन पर पूरी मेहनत करनी पड़ती है।ऐसा ज्यादातर देखा गया है मन में बहुत ज्यादा लग रहा था।
मगर उसने हार नहीं मानी सबसे पहले तो गुजरात में आसपास में जिस जगह वह रहते थे आस-पास के कोई एरिया में वैसा स्कूल था वह ढूंढा। वहां जाकर के आई और वहां की प्रिंसिपल से बात करके जब उन्होंने एश्योरेंस दिया उन्होंने खात्री दी कि हम ऐसे बच्चों को बहुत अच्छी तरह रखते हैं।
उसने पूरा स्कूल घूम कर देखा और फिर घर आकर दूसरे दिन में सिस्टर और उसकी पति को घर बुलाया, और उनको समझाया कि "तुम्हारी बच्ची अभी तो छोटी है तो तुम संभाल लोगे। यह इतनी प्यारी है और अगर यह कुछ करेगी तो उसकी जिंदगी सुधर जाएगी। इसको ऐसे इंस्टिट्यूट में डाला जाए जहां इसका विकास हो सके। मैं ऐसे इंस्टिट्यूट का पता लेकर आई हूं तुम भी जाकर देखो ।"
दोनों पहले तो बहुत आनाकानी कर रहे थे कि नहीं हमारी बच्ची है यह कमजोर है।
मगर फिर सोचा एक बार जाने में क्या तकलीफ है फिर वो रमा के साथ ही उस जगह जाकर आए प्रिंसिपल से मिलकर भी आए। उनको वहां का वातावरण बहुत अच्छा लगा।
क्योंकि सभी लड़कियां ही थी और सब उसी तरह की थी जैसी उसकी बेटी थी उनकी टीचर्स बड़े प्यार से उनको पढ़ा रही थी। और सब अपने अपने तरीके से काम भी कर रहे थे। जिसको जो पसंद आ रहा था वह काम कर रहा था। यह देख उस सिस्टर के मन में और उनके पति के मन में भी आशा जगी, और वे भी अपनी बच्ची को उस इंस्टिट्यूट में दाखिल करने को तैयार हो गए।
10 साल लगे बच्ची एकदम तैयार हो गई। और उसकी वही नौकरी भी लग गई यही बताने के लिए सतीश अपनी बेटी को लेकर आए थे। बेटी इतनी खूबसूरत लग रही थी, और इतनी आत्मविश्वास से भरी हुई लग रही थी लग ही नहीं रहा था कि उसमें कोई कमी है।
क्योंकि उसकी कमी तो उसकी ज्ञान ने पूरी कर दी थी ।
जिस तरह का ज्ञान उसको चाहिए था उसको उस इंस्टिट्यूट में मिल गया।यह देखकर रमा बहुत खुश हुई क्योंकि वह उस लड़की को 10 साल बाद देख रही थी। जब उसको वहां हॉस्टल में रखा था उसके बाद में आज ही उसको देख रही थी तो वह बिल्कुल बदल चुकी थी। उसको लग रहा था मेरी छोटी सी कोशिश और उसमें इसके मां-बाप का साथ वास्तव में बेटी का भविष्य ही सुधर गया।
हम अगर अपनी जिंदगी में किसी को सही रास्ता दिखाने के लिए और मदद करने के लिए थोड़ा हाथ बढ़ा दे। थोड़ी कोशिश कर ले तो तकलीफ शुदा लोगों जिंदगी बदल जाती है ।
मगर इसमें उन बच्चों के मां-बाप को भी मानना पड़ता है। मेरे सामने ऐसे भी उदाहरण हैं जिनको हम कह कह कर थक गए कि इनके लिए ऐसा इंस्टिट्यूट है वहां पर तुम बच्चे का दाखिला कराओ।
मगर यह मां-बाप सुनते ही नहीं जब बच्चा बड़ा होता है। और नहीं समझता है और बहुत बड़ा बोझ बन जाता है जीना मुश्किल कर देता है तब अपना रोना सबके सामने रोते रहते हैं। मगर समय रहते नहीं समझते।
इसीलिए खाली कोशिश करने वाले को नहीं ऐसे बच्चों के मां-बाप को भी जो लाभार्थी बनना चाहे तो ही काम हो सकता है। छोटी सी कोशिश तभी कामयाब होती है यह देखा परखा मामला है।
