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Ekta Rishabh

Inspirational

3  

Ekta Rishabh

Inspirational

आकांक्षाये !

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जैसे ही दरवाजे की घंटी बजी नेहा ने भाग के दरवाजा खोला अपने पापा को देख मुस्कुराते हुए उनके हाथों से टिफिन ले लिया।

"क्या कर रही है मेरी गुड़िया, अपनी बेटी को दुलार करते हुए अशोक ने घर के अंदर झांका और अंदर की शांति देख वो समझ गया आज भी पूजा घर पे नहीं है।"

बेटा मम्मी घर पे नहीं है क्या? अशोक ने अपनी बेटी नेहा से पूछा। " नहीं पापा, जब मैं और अनु स्कूल से घर आये तो पड़ोस की निशा आंटी ने हमें चाभी दी थी।"

खाना खाया तुम दोनों ने और अनु कहा है? अशोक ने पूछा।

"पापा, अनु को बुखार है मैंने पट्टी लगाई लेकिन सिर बहुत गर्म है।" नेहा की बात सुन घबरा कर अशोक कमरे में गया नन्ही अनु बेसुध बेड पे सोई थी।

घबराया अशोक तुरंत अनु को ले डॉक्टर के पास भागा डॉक्टर ने दवा दी और घर भेज दिया।


घर आते आते एक ब्रेड का पैकेट और दूध ले लिया अशोक ने जानता था आज बच्चों ने खाना नहीं खाया था। घर आ बच्चों को दूध गर्म कर ब्रेड के साथ खिला और अनु को दवा दे सुला दिया तभी पूजा भी आ गई। अशोक के सब्र का बांध अब टूट चूका था पूजा को देखते ही धीर गंभीर अशोक, पूजा को डांटने लग गया।

"ये क्या हरकत है पूजा, सारा सारा दिन गायब रहती हो। ना घर की फिक्र ना मेरे बच्चों की फिक्र। अनु बुखार से तड़प रही थी लेकिन उसकी माँ को अपनी किट्टी से फुर्सत कहा है।" आपने ही रौ में अशोक बोला चला जा रहा था। अनु को बुखार है जैसे ही पूजा ने सुना हाथ का पर्स फेंका और भाग के कमरे में गई। शांत स्वभाव अशोक आज अपने आपे से बाहर हो रहा था। तभी पूजा आ कर अशोक के पैरों पे गिर पड़ी और दोनों हाथ जोड़े रोने लगी।

ये क्या पूजा क्या हुआ? अनु अब ठीक है। इतना क्यों रो रही हो। पूजा को रोता देख अशोक एक छन में अपना गुस्सा जैसे भूल गया।


"क्या हुआ बताओ मुझे तुम तो अनन्या के घर किट्टी में गई थी ना फिर ऐसा क्या हो गया जो इतना रो रही हो।"

पूजा को बुरी तरह रोता देख अशोक घबरा सा गया था। रोते रोते पूजा ने जो कुछ बताया वो सुन अशोक अपना सिर पकड़ बैठ गया आज उसे खुद पे गुस्सा आ रहा था क्यों उसने पूजा के हर बात पे सहमति जताई क्यों नहीं रोका उसे।

कुछ महीने पहले पूजा के बचपन की सहेली अनन्या मार्केट में मिल गई बातें शुरू हुई और आना जाना भी। अनन्या के पति अच्छा कमाते थे और रईसी उनके हर बात से झलकती थी। वही अशोक एक साधारण कमाने वाला अपने परिवार को प्रेम करने वाला इंसान था।

थोड़े में ख़ुश रहना जानता था अशोक लेकिन पूजा के शौक बड़े थे और अनन्या को देखा देखी उसके शौक को भी हवा लग गई। अनन्या के किट्टी की मेंबर बन गई पूजा। बच्चों से और घर से ध्यान हट गया। बच्चे स्कूल से आते तो अक्सर घर पे ताला लगा मिलता।

अशोक जब टोकता तो पूजा लड़ने लग जाती, तुम खुद तो पुराने ख्याल के हो शौक नाम की कोई चीज नहीं है मैं दो पल हँस बोल लूँ तो तुम्हें परेशानी होती है। बच्चों का सोच अशोक चुप रह जाता।


आज दिखावे में अपने पड़ोसन का ब्रेसलेट पहन कर अनन्या के घर चली गई थी और वो ब्रेसलेट कब हाथों से फिसल गिर पड़ा पूजा को पता ही नहीं चला।

अब रोने से क्या होगा क्या कीमत होंगी उस ब्रेसलेट की बताओं पूजा। अशोक ने पूछा तो पूजा ने कहा, "डायमंड लगे थे निशा भाभी को उनके पति ने उनके जन्मदिन पे दिया था मुझे दिखाया कल तो मैंने मांग लिया एक दिन के लिये।" पूजा की बात सुन अशोक ने अपना सिर पिट लिया अब सोना होता तो वो फिर भी कुछ जुगाड़ करता हीरे की औकात तो उसकी इस जन्म में थी नहीं।

मुझे माफ़ कर दो अशोक। मुझसे क्या माफ़ी मांग रही हो अब क्या जवाब देंगे निशा भाभी को वो सोचो। नाराज़ हो अशोक ने कहा।

पूरी रात दोनों पति पत्नी ने बैठ कर काट दी कहीं कोई रास्ता नहीं दिख रहा था।

"एक काम करता हूँ कल बड़े साहब से बात कर लोन ले लेता हूँ फिर निशा भाभी को पैसे लौटा सारी बात बता देंगे और फिर जो भी वो कहेंगी सिर झुका के सुन लेंगे और इसके अलावा कोई और रास्ता मुझे तो दिख नहीं रहा।"

अशोक के सिर पे लोन और होने वाले अपमान के ख्याल से ही पूजा तड़प उठी। ये सब सिर्फ उसके अपनी गलतियों का नतीजा था। आज अपने औकात से ज्यादा पैर फैलाने का गंभीर नतीजा वो और उसका निर्दोष पति दोनों भुगत रहे थे।


सुबह होने वाली थी और निशा कभी भी आ सकती थी। पूरे मुहल्ले के सामने आज दोनों पति पत्नी की बेइज़्ज़ती होंगी, ये सोच सोच ठण्ड में भी पूजा पसीने पसीने हो गई। तभी दरवाजे की घंटी बजने की आवाज़ आयी धड़कते दिल से दरवाजा खोला।

दरवाजे पे निशा थी, पूजा भाभी मेरी ब्रेसलेट अगर काम हो गया हो तो दे देती। पूजा को काठ मार गया क्या ज़वाब दे तभी अशोक आ गए।

"अरे पूजा तुमने वो ब्रेसलेट वापस नहीं की बहुत सुन्दर है निशा भाभी पूजा ने मुझे भी दिखाया था। आप घर चले मुझे तुंरत निकलना है ऑफिस तो मुझे भेज पूजा आती है आपके घर ब्रेसलेट वापस करने।"

आश्चर्य से पूजा अपने पति को देख रही थी आज पहली बार अशोक जैसे पवित्र इंसान को उसके कारण झूठ बोलना पड़ा था। शर्म से पूजा का सिर झुक गया।

माफ़ कर दो अशोक पूजा रुआँसी हो कहा। परेशान ना हो पूजा ब्रेसलेट मिल गई है। कार्पेट के नीचे पड़ी मिली अनन्या को मेरे पास फ़ोन आया था आधे घंटे में वो घर ले कर आ रही है।

अशोक की बात सुन पूजा का बदन काँप गया लगा जैसे सपना देख रही हो। अशोक के गले लग फुट फुट के रो पड़ी पूजा।

माफ़ कर दो अशोक मैंने अपनी चादर से ज्यादा पैर फैला दी थी लेकिन ये सिर्फ तुम्हारे अच्छे कर्म है जो आज वो ब्रेसलेट मिल गया और हम बेइज़्ज़त होने से बच गए।


अनन्या ने आ कर ब्रेसलेट दिया और जाते जाते पूजा से कहा कल आ रही हो ना किट्टी में पूजा। अशोक ने पूजा को और पूजा ने अशोक को देखा, "नहीं अनन्या अब और किट्टी नहीं मेरे बच्चों को मेरी जरूरत है लेकिन जब भी दिल करेगा मैं आऊँगी ना तुझसे मिलने।"


जैसी तेरी मर्जी और अनन्या चली गई पूजा और अशोक मुस्कुरा के गले लग गए। आज अशोक को अपनी पहले वाली पूजा वापस मिल गई थी और पूजा भी समझ गई थी, "इंसान को जितनी लम्बी चादर हो उठना पैर फैलाना चाहिए " दूसरों की देखा देखी का फल सिर्फ परेशानी और दुःख ही होता है



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