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तीन दिन   भाग 1
तीन दिन भाग 1
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© Mahesh Dube

Thriller

6 Minutes   7.3K    23


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शुक्रवार  14 अगस्त  सुबह 6 बजे

      निर्जन स्थान पर बसे हुए एक किले में एक साथ कई देशी विदेशी गाड़ियाँ पहुंची और उनमें से हंसते खिलखिलाते कई स्त्री पुरुष उतरे। उन्होंने एक दूसरे के गले लग कर अभिवादन का आदान प्रदान किया और भीतर दाखिल हो गए।  यह शहर के कुछ सम्पन्नतम और साधारण लोगों का ऐसा दुर्लभ दल था जो अपनी मित्रता के लिए पूरे शहर में मशहूर था। इस दल की अगुआई शहर के दबंग नेता और सिटिंग एम पी रमन सिंह और उनकी पत्नी छाया कर रहे थे।  रमन सिंह बेहद यारबाज  इंसान थे। अपने दोस्तों में उनकी जान बसती थी। उनके कई दोस्त तब से उनके साथी थे जब वे नाड़े वाला पाजामा पहन कर नंगे पाँव स्कूल जाया करते थे। बाद में रमन बहुत बड़े आदमी बन गए पर आज भी उनका पनवाड़ी मित्र सुरेश चौरसिया अपनी पत्नी के साथ इस दल में शामिल था जो बेहद साधारण हैसियत का मालिक था। पर रमन सिंह का बचपन से पक्का मित्र था और अपने स्वाभिमान के चलते रमन की मदद की अनेक पेशकश ठुकराते हुए पान की छोटी सी दूकान चलाकर उदर पोषण करता था। उसकी पत्नी बिंदिया भी उसी की तरह मेहनती, कर्मठ तथा बेहद मीठे स्वभाव की महिला थी और इस ग्रुप में बेहद लोकप्रिय भी थी। इसी तरह शराब का बड़ा व्यवसाई  गुंडप्पा भी अपनी पत्नी मधुलिका के साथ इस दल में आया हुआ था। वह तमिलनाडु का रहने वाला था पर उसकी पत्नी बंगाली बाला थी जो पहले एयरहोस्टेस थी। इन दोनों ने प्रेम विवाह किया था। पहले गुंडप्पा एक साधारण होटल मालिक था पर जैसे-जैसे उसके मित्र रमन सिंह प्रगति के सोपान चढ़ते गए अपनी तीव्र बुद्धि के चलते उनकी सहायता और अपने अध्यवसाय के चलते आज वह शहर का ही नहीं बल्कि प्रदेश का सबसे बड़ा शराब व्यवसाई था और मजे की बात यह थी कि उसने जीवन में शराब की एक बूँद भी नहीं चखी थी और रोज सुबह घण्टों भगवान् बालाजी की पूजा करता था पर उसकी पत्नी मधुलिका कभी-कभी गला तर कर लेने में विश्वास रखती थी। इसी तरह सोने चांदी के विशाल शोरूम का मालिक झाँवरमल सोनी और उसकी बीवी बादाम बाई भी आए थे। झाँवरमल सींक की तरह दुबला पतला इंसान था जो अपने गले में भैंस की सीकड़ जितनी मोटी सोने की चैन पहनता था उसकी आवाज भी उसी की तरह पतली और तीखी थी जो सुनने वाले के कानों को मानो चीर देती थी। उसकी बीवी बादाम खांटी राजस्थानी थी।  वह तर माल खाकर सोने में विश्वास रखती थी तो समृद्धि उसके बदन पर चर्बी की शक्ल में ऐसी जम गई थी कि उनकी जोड़ी को लोग सींक और फुटबॉल की जोड़ी कहते। वैसे वह बेहद सीधी और भोली औरत थी। उसे पूरब पश्चिम कुछ पता नहीं था। जो उसका महाचालू पति कहता वही करने में  प्राणप्रण से लग जाती। एक आदर्शवादी अध्यापक सुदर्शन अपनी विद्वान पत्नी शोभा के साथ इस ग्रुप की शोभा बढ़ाते थे जिन्हें शेरोशायरी का भी बेहद शौक था और वे हर विषय पर अपनी बुद्धिमत्ता पूर्ण राय दे सकते थे। शोभा पहले उनकी विद्यार्थी थी जो उनके मार्गदर्शन में शोध कर रही थी पर बाद में दोनों ने विवाह कर लिया। इन सभी जोड़ों में एक अजीब जोड़ा था मंगतराम गुरनानी और नीलोफर का। अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद मंगतराम ने अपनी बेटी की उम्र की नीलोफर से दूसरी शादी कर ली थी जिसका उनके परिवार में खूब विरोध हुआ था। नीलोफर की उम्र के ही उसके पांच सौतेले बेटे बेटी उसे माँ का दर्जा देने को राजी न थे तो आए दिन चख-चख चलती रहती थी जिसके कारण मंगत का उबा हुआ मन अपनी इसी मित्र मण्डली में सुकून पाता था। मंगतराम के पास अथाह दौलत थी और नीलू अब उसी के उपभोग में खुश थी। वो बेहद खूबसूरत और चालाक लड़की थी जिसे अपने रूप का उपयोग हथियार की तरह करने का हुनर बखूबी आता था और उसी के दम पर वो मंगतराम की दौलत की कानूनी वारिस थी। मशहूर हार्ट स्पेशलिस्ट मानव मिश्र और उनकी गायनिक स्पेशलिस्ट पत्नी कामना तथा राष्ट्रीय पहलवान चन्द्रशेखर यादव अपनी पत्नी सुरेखा के साथ इस ग्रुप का सदस्य था। मजदूर नेता सदाशिव म्हात्रे अपनी पत्नी ललिता के साथ हाजिर था।

                  इस ग्रुप का नाम मैत्री ग्रुप था।  ये सब महीने में एक दो बार  मिलजुल कर मौज मस्ती करते और एक दूसरे के सुख-दुःख जाना करते थे। रमन सिंह के रसूख और बाकी सदस्यों की सामाजिक आर्थिक सुदृढ़ता के चलते इन्हें किसी चीज की समस्या नहीं होती थी। 

             रमन सिंह के साथ चलते हुए सभी एक बड़े से हॉल में पहुंचे और एक घेरा बनाकर खड़े हो गए। रमन सिंह ने एक पल को अपनी साँसे व्यवस्थित की और बोले, मेरे अजीजों! दोस्तों और खैरख्वाहों! मैं अपना निमंत्रण स्वीकार करने के लिए आप सभी को धन्यवाद देता हूँ। आज हम फिर यहां इकठ्ठा होकर तीन दिन ऐसी मस्ती और धमाल करेंगे कि यह टूर हमें आजीवन याद रहेगा। 

लेकिन यार रमन! इस बार ये तीन दिन का टूर ये जंगल के किल्ला में कायको रखा बाबा! हरदम के जैसा कोई होटल रिसोर्ट में कायको नई ? सदाशिव बीच में ही बोला।

नए पन में ही मजा है सदानन्द! रमन मुस्कुराते हुए बोला, तर माल खाने वालों को कभी कभी मक्के की सूखी रोटी भी अच्छी नहीं लगती क्या ? और जोर से ठहाका लगा कर हंस पड़ा।

बाकी लोग भी हंस पड़े। मधुलिका बोली, रमन भइया! ये तो बताओ हम लोग यहाँ करेंगे क्या?

रमन बोले,"मेरे मन में एक कठिन पर अद्भुत विचार आया है। हम लोग एडवेंचर करेंगे अपनी रूटीन लाइफ से हटकर तीन दिन, दीन दुनिया से कट कर जिएंगे। बाहर की दुनिया से संपर्क बिलकुल कट! नो मोबाइल नो कम्प्यूटर। 

नीलू तुरन्त सर हिलाती हुई बोली 'ओह माय गॉड! मोबाइल के बिना नहीं चलेगा। मैं तो पांच मिनट में मोबाइल पर फेसबुक स्टेट्स न चेक करूँ तो घुटन होने लगती है।  

रमन सिंह हँसते हुए बोले नीलू। डोंट वरी!! हम सब साथ रहेंगे तो अकेलापन होगा ही नहीं। सब अपने अपने मोबाइल अभी जमा करो इधर! इतना  कहकर उन्होंने अपनी जेब से दो काफी महंगे मोबाइल निकाले और स्विच ऑफ करके अपने पी ए श्रीवास्तव जी को दे दिए। श्रीवास्तव अपने पास एक सफेद रंग का कपड़े  का झोला लिए हुए था जिसमें उसने बारी बारी सबके मोबाइल लेकर डाल दिए और उसपर गाँठ लगा दी। कुछ नौकर खाने पीने का और रोजमर्रा के काम आने वाला बहुत सारा सामान एक वैन से उतार रहे थे।  जिसे करीने से जमा कर वे चलते बने। फिर श्रीवास्तव ने बाहर निकल कर किले का विशाल दरवाजा बंद कर दिया और अपनी कार से रवाना हो गया। पीछे अठारह लोग अकेले रह गए   जिनका संपर्क दुनिया से पूरी तरह कट चुका था। अब तीन दिन के लिए यही किला उनकी दुनिया था!

कहानी आगे जारी है .......

पढ़िए भाग 2

रहस्य रोमांच मर्डर मिस्ट्री

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