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बाढ़ ही बाढ़
बाढ़ ही बाढ़
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© Mahesh Dube

Comedy

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समूचे उत्तर भारत में भयानक बाढ़ आई हुई है। गाँव के गाँव जलमग्न हो गए हैं। जल, जो कि जीवन है वही जीवन का गला दबोचे अट्टहास कर रहा है। प्रशासन राहत पहुंचाने के अपने कौशल पर अपनी पीठ ठोंक रहा है और बाढ़ पीड़ित अपना माथा! बाढ़ पीड़ितों की समझ में नहीं आ रहा है कि जो राहत ऊपर से चलती है वह उन तक पहुँच क्यों नहीं पाती? वैसे देश में केवल एक बाढ़ आई हो ऐसा नहीं है। हर क्षेत्र में बाढ़ ही बाढ़ है। प्याज के दाम पांच पैसे किलो हो जाने के कारण किसानों की आँखों में आंसुओं की बाढ़ आई है। वैसे अब किसानों को प्याज बोना चाहिए। लेकिन अब कोई प्याज नहीं बोयेगा और अगली फसल में प्याज की ऐसी किल्लत होगी कि फिर प्याज सौ रुपये के पार बिकेगा।

 

ओलम्पिक के कांस्य और रजत पदक विजेताओं के घर सम्मान और पुरस्कारों की बाढ़ आई हुई है। बाढ़ हमेशा खराब हो ऐसा भी नहीं है। इन खिलाड़ियों के घर समृद्धि की ऐसी बाढ़ आई है जिसने कई पीढ़ियों की गरीबी का मलबा बहाकर मामला एक दम चकाचक कर दिया है। चढ़ते सूरज को सलाम करना हमारी आदत है। लेकिन अगर इस बाढ़ के कुछ छींटे प्रतिभाशाली परंतु वंचित खिलाड़ियों तक भी पहुँच जाएं तो अगली स्पर्धाओं में हमें और गौरवान्वित होने का मौका मिल सकता है। 

 

देश में कई प्रकार के चुनाव आसन्न हैं तो आश्वासनों, वादों की भी बाढ़ आई हुई है। हर कोई अपनी कमीज उजली बताने की घोर कवायद में लगा हुआ है। विरोधी पक्ष पर इल्जामों की बाढ़ के साथ साथ संसदीय और असंसदीय भाषा के उपयोग की भी बाढ़ आई है। कोर्ट द्वारा मजार में महिलाओं के प्रवेश को वैध बताने के फैसले पर महिलाओं के उत्साह में अभूतपूर्व बाढ़ देखी जा रही है वहीं पुरातनपंथी मुल्ला पंडितों में निराशा की बाढ़ का प्रवाह तेज है।

 

कुल मिलाकर देश इस समय कई तरह की बाढ़ों का सामना कर रहा है। दुबक कर बैठे रहिये। बाहर निकलना खतरनाक है। 

 

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